सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ सूर्य-सिद्धान्त अग्राज्या लिखा है इष्टकालिक कर्णाग्रा या जैसा भास्कराचार्य लिखते हैं कर्णवृत्ताग्रा कहना अधिक उचित होगा । अग्रा से केवल वह कोण समझना चाहिए जो क्षितिज- वृत्त पर पूर्व या पच्छिम विन्दु से सूर्य, ग्रह या तारे का अंतर होता है । चित्र ४३ में उदयकालिक ग्रह का स्थान क्षितिज वृत्त के ग विन्दु पर है और पूर्व विन्दु प है इसलिए ग्रह की उदयकालिक अग्रा ग पू धनु है । इसी प्रकार ग्रह की अस्तकालिक अग्रा गा प धनु है क्योंकि प पच्छिम विन्दु और गा ग्रह का अस्तकाल के समय का स्थान है । यदि ग अथवा गा विन्दुओं से पूर्व पच्छिम रेखा पर लम्ब गिराया जाय तो इसी का मान उदयकालिक अग्राज्या के नाम से व्यवहार किया जायगा । चित्र ४२ में प श सीधी रेखा उदयकालिक ग्रह की अग्राज्या है । उदयकाल के सिवा किसी अन्यकाल में सूर्य का ऊर्ध्ववृत्त क्षितिज के जिस विन्दु पर गिरेगा उस विन्दु से पूर्व या पच्छिम विन्दु का अन्तर इष्टकालिक अग्रा कही जायगी । २२वें श्लोक में अक्रांग्रा उदयकालिक सूर्य की अग्राज्या के लिए, इष्टकर्ण इष्ट- काल के छायाकर्ण के लिए और मध्यकर्ण त्रिज्या के लिए प्रयोग किये गये हैं इसलिए इनको ध्यान में रखना चाहिए । किसी-किसी अनुवादक ने मध्यकर्ण को मध्याह्न कालिक छायाकर्ण माना है परन्तु यह भ्रम है । मध्यकर्ण को रंगनाथ जी ने त्रिज्या इस तरह सिद्ध किया है -- "कर्णस्य व्यासस्य मध्यमर्धमिति मध्यकर्णो व्यासार्ध- त्रिज्यांतयेत्यर्थः ।" * व्यास के अर्थ में कर्ण का प्रयोग मध्यमाधिकार के ५६ वें श्लोक मे भी हुआ है । इसी अधिकार के अगले २७ वें श्लोक में यही नियम दुहराया गया है जिसमें मध्यकर्ण की जगह त्रिज्या का प्रयोग किया गया है । इसलिए मध्यकर्ण का अर्थ त्रिज्या के सिवा और कुछ नहीं है । इस श्लोक का सार यह है :-- अग्राज्या = क्रान्तिज्या x विषुवत्कर्ण / १२ (१) कर्ण वृत्ताग्रा = अग्राज्या x इष्ट छायाकर्ण / त्रिज्या = क्रांतिज्या x विषुवत्कर्ण / १२ x इष्ट छायाकर्ण / त्रिज्या (२) परंतु विषुवत्कर्ण / १२ = त्रिज्या / अक्षांश कोटिज्या [देखो १३वें श्लोक का भाष्य] इसलिये अग्रा ज्या = क्रान्तिज्या x त्रिज्या / अक्षांश कोटिज्या (३) *वेङ्कटेश्वर प्रेस का सूर्य सिद्धान्त, पृष्ठ ८० ।