सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० सूर्य-सिद्धान्त स्वाधोऽधः प्रविशोध्यथ मेषाल्लङ्कोदयासवः ॥४२॥ खागाष्टयोऽर्धगोऽनैकाशशरत्र्यङ्कहिमांशवः । स्वदेशचरखण्डोना भवन्तीष्टोदयासवः ॥४३॥ व्यस्ता व्यस्तैर्युतास्तैस्तैः कर्काद्यसवस्मृताः । व्युत्क्रमेण षडेवैते भवन्तीष्टास्तुलादय ॥४४॥ अनुवाद- (४१, ४२) एक, दो और तीन राशियों की ज्याओं को क्रम से तीन राशियों की द्युज्या से गुणा कर दो और गुणनफलों को क्रम से एक, दो और तीन राशियों के अहोरात्रार्धों (द्युज्याओं) से भाग दे दो, भजनफलों के धनु बनाकर अलग अलग रखो । पहला लंका में मेष राशि का उदयासु है, पहले को दूसरे से घटाने पर जो शेष आता है वह लंका में वृष राशि का उदयासु है और दूसरे को तीसरे से घटाने पर जो शेष होता है वह लंका में मिथुन राशि का उदयासु है । (४३) इनके मान क्रमानुसार १६७०, १७६५ और १८३५ असु अथवा प्राण हैं। इनसे इष्ट स्थान के अपने अपने चरखण्ड घटाने पर इष्ट स्थान के मेष, वृष और मिथुन राशियों के उदयासु जाने जाते हैं। (४४) यहीं उलटे क्रम से कर्कादि तीन राशियों के लंका में उदयासु हैं। इन्हीं में उलटे क्रम से अपने अपने चरखंडों को जोड़ने से इष्ट स्थान के कर्क, सिंह और कन्या के उदयासु होंगे । यही ६ उदयासु उलटे क्रम से तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन के उदयासु हैं । विज्ञान भाष्य—सायन मेष अर्थात् वसंत संपात विन्दु क्षितिज के पूर्व विन्दु पर जिस क्षण आता है उस समय से सायन मेष राशि का उदय होने लगता है और जिस क्षण तक वसंत सम्पात से क्रान्ति वृत्त का ३० अंश क्षितिज के ऊपर नहीं आ जाता उस समय तक सायन मेष राशि का उदय होता रहता है । जितने समय में वसंत सम्पात विन्दु से क्रान्ति वृत्त का ३० अंश उदय होता है उसको सायन मेष राशि का उदयकाल कहते हैं। यह सूक्ष्मता के लिए असुओं में प्रकट किया जाता है । इसीलिए इस समय को सायन मेषराशि का उदयासु कहते हैं । इसके पश्चात् क्रान्ति वृत्ति का अगला ३० अंश जितने समय में उदय होता है उसको सायन वृष राशि का उदय काल या उदयासु कहते हैं। इसी प्रकार अन्य सायन राशियों के उदयासुओं के बारे में समझना चाहिए । किसी स्थान में कौन राशि कितने समय में उदय होती है यह जानने के लिए पहले यह जानना सुगम होता है कि वह राशि विषुवत् रेखा (निरक्षदेश equator) पर कितने समय में उदय होती है। जब यह ज्ञात हो गया तब अपने स्थान का उदय काल जानने के लिए निरक्षदेश के उदय काल में कुछ संस्कार करना पड़ता है ।