सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०२ सूर्य-सिद्धान्त पू के उदय होने में लगता है । परन्तु पूरे विषुवद्वृत्त (३६०°) के उदय होने के समय को एक नाक्षत्र दिन* कहते हैं जो २१६०० असुओं के समान होता है (पृष्ठ ६); इसलिए विषुवद्वृत्त के ३६०° अथवा २१६०० कला के उदय होने में जब २१६०० असुओं का समय बीतता है तब १ कला के उदय होने में १ असु का समय लगेगा । इसलिए यदि व पू का मान कलाओं में ज्ञात हो जाय तो उतने ही असुओं में व का का उदय काल निकल आवेगा । अब देखना है कि व का और व पू का परस्पर क्या सम्बन्ध है । व पू का एक समकोण गोलीय त्रिभुज है जिसका व पू का कोण समकोण है और पू व का कोण विषुवद्वृत्त और क्रान्ति वृत्त के बीच का कोण अर्थात् सूर्य की परम क्रान्ति है । इस गोलीय त्रिभुज का भुज पू का क्रान्ति वृत्त के का विन्दु की क्रान्ति, भुज व का, का विन्दु का सायन भोगांश और भुज व पू, का विन्दु का विषुवांश है (देखो पृष्ठ २०१) इसलिए नेपियर के पहले नियम के आधार पर व का और व पू का सम्बन्ध जाना जा सकता है क्योंकि कोटि ज्या ∠ का व पू = स्पर्शरेखा (व पू) × कोटि स्पर्शरेखा (व का) अथवा, विषुवांश की स्पर्शरेखा = परम क्रान्ति कोटिज्या / सायन भोगांश की कोटि स्पर्शरेखा = कोज्या २३° २७' / कोस्परे (सायन भोगांश) परन्तु हमारे आचार्य स्पर्शरेखा या कोटि स्पर्शरेखा का व्यवहार नहीं करते थे इसलिए उन्होंने गोलीय त्रिभुज उ व का से इनका सम्बन्ध इस प्रकार निकाला था :— ज्या (उ का) / ज्या (उ व का) = ज्या (व का) / ज्या (व उ का)
- पृष्ठ ७ पर बतलाया गया है कि किसी तारे के उदय होने के समय से उसके फिर उदय तक के समय को नाक्षत्र अहोरात्र या नाक्षत्र दिन कहते हैं । इसलिए वसन्त सम्पात विन्दु के उदय होने के समय से उसके फिर उदय होने तक के समय को भी नाक्षत्र दिन नहीं समझना चाहिए क्योंकि इतने समय में यह विन्दु अयन चलन के कारण लगभग ०.१४ विकला पच्छिम हो जाने के कारण ०.००२ असु पहले उदय होगा । परन्तु यह भेद इतना सूक्ष्म है कि व्यवहार में दोनों परिभाषाओं को एक ही समझ लेने में कोई हानि नहीं । आजकल पाश्चात्य ज्योतिषी नाक्षत्र दिन की परिभाषा वही करते हैं जो पीछे दी हुई है ।