सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविप्रश्नाधिकार ३६३ ज्या अ = घा X ज्या वा; ज्या अ = धि X ज्या वि ∵ घा X ज्या वा = धि X ज्या वि अथवा ज्या वा / ज्या वि = धि / घा इससे यह सिद्ध होता है कि यदि एक पदार्थ ह ह से दूसरे पदार्थ हा हा का वर्तनाङ्क धा हो और पहले ही पदार्थ से तीसरे पदार्थ हि हि का वर्तनांक धि हो और यदि हा हा से हि हि में जाने वाली किरण का आपात कोण वा और वर्तित कोण वि हो तो दूसरे पदार्थ हा हा से तीसरे पदार्थ हि हि में जाने वाली किरण का वर्तनाङ्क धि ÷ घा होगा । ज्योतिष संबंधी वर्तन—खगोल पिंडों से जो प्रकाश पृथ्वी पर आता है उसकी किरणें जब वातावरण में घुसती हैं तब इनमें वर्तन होता है। ऐसे वर्तन को ज्योतिष संबंधी वर्तन (Astronomical refraction) कहते हैं। वातावरण का घनत्व ऊपर से नीचे तक एक सा नहीं है। जैसे जैसे पृथ्वी से दूरी अधिक होती जाती है तैसे तैसे वातावरण पतला होता जाता है इसलिए कुल वातावरण सजातीय नहीं है। खगोलीय पिंड से आती हुई किरण जब वातावरण में प्रवेश करती है तब पहले बहुत पतले स्तर में जाती है और ज्यों ज्यों पृथ्वी के निकट पहुंचती आती है त्यों त्यों कम घने से अधिक घने स्तर में आने के कारण वह लम्ब की ओर कुछ कुछ झुकती हुई पृथ्वी पर पहुँचती है। इसलिए वातावरण में इसका मार्ग वक्र होता है। पृथ्वी पर पहुँचते समय किरण की जो दिशा होती है उसी में खगोलीय पिंड देख पड़ता है। किसी तारे से कोई किरण त क की दिशा में क तक सीधी आकर क स्थान पर वातावरण में प्रवेश करती है। इस स्थान से इसकी राह सीधी नहीं रहती। क से द्रष्टा के स्थान द तक किरण को वातावरण के भिन्न-भिन्न स्तरों में घुसना पड़ता है जो क्रमशः घनी होती जाती हैं। इसलिए किरण भी क्रमशः वक्र होती जाती है और अन्त में द तक पहुँच जाती है। इस वक्र के द बिन्दु पर द ति स्पर्शरेखा है। द्रष्टा को जान पड़ता है कि तारा द ति दिशा में है। यदि द से द ता रेखा क त के समानान्तर खींची जाय तो द ता* दिशा में तारा उस समय देख पड़ता जब किरण को झुका देनेवाला वातावरण न होता। इसलिए वातावरण का प्रभाव यह हुआ कि
- बिलकुल शुद्ध दिशा द त है परन्तु त तारा इतनी दूर है कि त द ता कोण शून्य के समान है।