सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमध्यमाधिकार १६ जाने वाले अंक का सूचक शब्द, फिर सैकड़े के स्थान में लिखे जाने वाले अंक का सूचक शब्द क्रम से रख दिये जाते हैं। जैसे ३२५ कहना हुआ तो पहले ५ का सूचक कोई शब्द पंच, इषु, मार्गण इत्यादि लिखकर उसके पीछे २ का सूचक कोई शब्द द्वि, अश्वि, यम इत्यादि लिखा जाता है, फिर ३ का सूचक त्रि, अग्नि, शिखि इत्यादि लिखा जाता है। इस तरह ३२५ को हम पंचाश्विशिखि या इषुयमाग्नि लिख सकते हैं। सूर्य्य सिद्धान्त, ब्राह्मस्फुट-सिद्धान्त तथा सिद्धान्त-शिरोमणि में संख्याओं के लिखने की यही परिपाटी है। प्रथम आर्यभट के आर्यभटीय तथा दूसरे आर्यभट के महा- सिद्धान्त में संख्या लिखने की रीतियां इससे भिन्न हैं । एक महायुग में ग्रहों के जितने भगण होते हैं वह सूर्य्य सिद्धान्त के अनुसार ऊपर दिये गये हैं। आर्यभट तथा ब्रह्मगुप्त के सिद्धान्तों के अनुसार महायुगीय भगणों के मानों में कुछ अंतर है तथा आजकल सूक्ष्मयंत्रों की सहायता से भगणों के जो मान जाने गये हैं वह भी किसी सिद्धान्त के अनुसार नहीं मिलते वरन् थोड़ी सी भिन्नता रखते हैं। अगले पृष्ठ में हम सूर्य्य सिद्धान्त, ब्रह्मगुप्त-सिद्धान्त तथा आधुनिक भगण- कालों के मान तुलनात्मक दृष्टि से देते हैं, जिनसे यह प्रकट होगा कि हमारे प्राचीन ज्योतिषियों के निकाले हुए भगण काल में और आजकल के सूक्ष्मयंत्रों के द्वारा निकाले हुए भगण काल में कितना कम अंतर है । जितने समय में किसी ग्रह का एक भगण या चक्कर पूरा होता है उसको भगण काल कहते हैं। इसके निकालने की रीति सिद्धान्त के अनुसार यह है कि एक महायुग में जितने भगण उस ग्रह के होते हैं उससे महायुग के सौर वर्षों में भाग दे दीजिये तो १ भगण काल (सौर वर्षों में) निकल आवेगा । अब इसको चाहे आप दशमलव भिन्न में लिखिये और चाहे सावन दिनों में । सावन दिनों में भगणकाल निकालने के लिए सबसे सुगम रीति यह है कि महायुग में जितने सावन दिन हों उनमें महायुगीय भगण का भाग दे दीजिये, जितनी लब्धि आवे वह सावन दिन है । शेष की घड़ी, पल, विपल इत्यादि बना लीजिये । जैसे १ घड़ी में ६० पल होते हैं वैसे ही १ पल में ६० विपल की तथा १ विपल में ६० प्रतिविपल की भी कल्पना की जा सकती है । इन श्लोकों में जिन नये शब्दों का प्रयोग हुआ है वह हैं ग्रह-शीघ्र, चन्द्रोच्च और पात । इन शब्दों को समझने के लिए पहले हमको अपने ऋषियों की उन कल्पनाओं का ज्ञान होना चाहिये जिन्हें उन्होंने ग्रहों की चाल के सम्बन्ध में मान रखी थीं । उन्होंने पृथ्वी को अचल समझा था और सूर्य्य, चन्द्रमा, ग्रहों और नक्षत्रों को पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए समझा था । परन्तु इतने से ही ग्रहों की गतियों का हिसाब ठीक-ठीक नहीं निकलता था; इसलिए उन्होंने ग्रहशीघ्रों की कल्पना की थी। वह यह तो देखते ही थे कि दो ग्रह बुध और शुक्र सूर्य के आसपास ही रहते हैं; इसलिए