सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार ४०६ के प्रायः १५ गुने के समान है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि जिस समय ग्रह यथार्थ क्षितिज पर रहता है उस समय यह स्पष्ट क्षितिज से अपनी दैनिक गति के १५वें भाग के समान नीचे रहता है। अर्थात् ग्रह का परम लंबन उसकी दैनिक गति के १५वें भाग के समान होता है। एक दिन ६० घड़ी के समान होता है इसलिए ६० घड़ी में जो गति होती है उसका पन्द्रहवां भाग चार घड़ी की गति के समान हुआ। इसका अर्थ यह हुआ कि ग्रह चार घड़ी में जितना चलता है उतना ही उसका परम लंबन (कलाओं में) होता है। समय की इकाइयों में ग्रह का परम लंबन ४ घड़ी के समान होता है। यदि ग ग्रह की दैनिक कोणात्मक गति, य उसकी दैनिक योजनात्मक गति, ल परम लंबन, क पृथ्वी से ग्रह कक्षा की दूरी और त्र पृथ्वी का अर्द्धव्यास हो तो ऊपर लिखी बातें इस प्रकार भी प्रकट की जा सकती हैं :— ल = ग/१५ = य/(१५ क) = त्र/क क्योंकि यदि ग्रह बहुत दूर हो तो उसकी दैनिक योजनात्मक गति को अर्थात् १ दिन में ग्रह अपनी कक्षा का जितना धनु (arc) चलता है उसको कक्षा के अर्द्धव्यास से भाग देने पर उसकी दैनिक कोणात्मक गति ज्ञात होती है इसलिए ग = य/क । परन्तु य को १५ से भाग देने पर जो आता है वह पृथ्वी के अर्द्धव्यास के समान होता है इसलिए य/१५ = त्र । इससे सिद्ध हुआ कि हमारे आचार्यों ने परम लंबन का परिमाण जानने के लिए जो नियम बनाये थे वह आजकल के बनाये नियम से बहुत कुछ मिलते जुलते हैं (देखो पृ० ३८३) । परन्तु इसमें भूल यह थी कि ग्रह की योजनात्मक गति समान नहीं है जैसा कि आजकल के वेधों से सिद्ध होता है इसलिए हमारे आचार्यों के बताये हुए नियम से परम लंबन के जो मान आते हैं वे आजकल के वेधों द्वारा आये हुए परम लंबनों से बहुत भिन्न हैं। पृष्ठ ४१० की तुलनात्मक सारिणी से यह बात स्पष्ट हो जायगी । अब यह बतलाना आवश्यक है कि हमारे आचार्य ग्रह का परम लम्बन जानकर उसका स्पष्ट भोगांश लंबन और शर लंबन अथवा नति कैसे जानते थे । भास्कराचार्य जी लिखते हैं कि (१) जिस समय ग्रह खस्वस्तिक पर रहता है उस समय उसमें किसी प्रकार का लंबन नहीं होता क्योंकि पृथ्वी के केन्द्र से ओर द्रष्टा से