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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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४४४ सूर्य्य-सिद्धान्त स्पर्शरेखा को बढ़ाने से प्रकाशमान पिंड पर निश्चय किया जाता है। यदि ऊ छा खंड में कहीं छेद किया जाय तो प्रकाशमान पिंड के नीचे का भाग देख पड़ेगा। परन्तु यदि छेद छ छा खंड में किया जाय तो प्रकाशमान पिंड का कोई भाग नहीं देख पड़ेगा। सारांश यह कि यदि द्रष्टा अ आ त रेखा के ऊपर परन्तु ता अ उ के नीचे कहीं रहेगा तो उसे र पिंड का ऊपरी भाग अवश्य देख पड़ेगा परन्तु नीचे वाला भाग नहीं देख पड़ेगा। इसी प्रकार इ ई त रेखा के नीचे और अ ई ऊ रेखा के ऊपर द्रष्टा के रहने से प्रकाशमान पिंड का नीचे वाला भाग अवश्य देख पड़ेगा परन्तु ऊपर वाला भाग नहीं देख पड़ेगा। यदि पट त विन्दु पर लाया जाय तो यहाँ छाया नाममात्र को भी नहीं रहेगी। प्रकाशमान पिंड देख तो नहीं पड़ेगा परन्तु इसकी चमक चारों ओर कुछ अवश्य देख पड़ेगी। यदि पट त से और दूर किया जाय तो एक ओर ही दृश्य देख पड़ेगा। क ख और ग घ परिछाया के खंडों में तो पहले की ही तरह बात देख पड़ेगी परन्तु ख ग खंड में जो छाया की सीमा बनाने वाली रेखाओं के बीच में है प्रकाशमान पिंड का किनारे वाला पूरा भाग देख पड़ेगा परन्तु बीच में अन्धकार रहेगा (देखो चित्र ६२)। चित्र से यह प्रकट ही है कि ख ग के बीच किसी विन्दु से च पिंड को स्पर्श करती हुई जो रेखाएँ खींची जायेंगी वह र पिंड के ऊपर नीचे दोनों ओर पहुँचेंगी। पिंड गोल है इसलिए बीच में अन्धकारमय होने से कंकण की तरह देख पड़ेगा। यह सब दृश्य प्रयोग द्वारा देखे जा सकते हैं। एक गोल लम्प, गेंद तथा लकड़ी के चौखटे में तने हुए पट, बस तीन चीजें इसके लिए पर्याप्त हैं। र पिंड की जगह गोल लम्प और च की जगह गेंद को समझना चाहिए। अंधेरी रात में किसी स्थान में यह प्रयोग सहज ही किया जा सकता है। इसी प्रयोग से सूर्य ग्रहण की सारी बातें समझ में आ सकती हैं। र को रवि या सूर्य और च को चन्द्रमा समझना चाहिए। पट की जगह पृथ्वी को समझना चाहिए। जिस तरह यह पिंड के निकट रहने पर छाया और परिछाया दोनों में रहता है परन्तु दूर रहने पर केवल परिछाया या छाया की सीमा बनाने वाली रेखाओं के बीच में रहता है, इसी तरह पृथ्वी भी कभी चन्द्रमा के निकट रहने से चन्द्रमा की छाया और परिछाया दोनों में रहती है और कभी दूर रहने से केवल प र छाया में ही रहती है। पृथ्वी चन्द्रमा से बहुत बड़ी है इसलिए सारी पृथ्वी छाया या परिछाया में नहीं पड़ सकती। पृथ्वी का जो भाग छाया में पड़ जाता है वहाँ के निवासियों को सूर्य बिलकुल नहीं देख पड़ता। इसलिये सूर्य का पूर्णग्रहण या सर्वग्रहण (total eclipse of the sun) होता है। पृथ्वी का जो भाग परिछाया में पड़ता है वहाँ के