सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 497, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ें४७२ सूर्य-सिद्धान्त उन्मीलन काल के समय ज्ञात होंगे । यदि यह दो मान काल्पनिक हों तो समझना चाहिए कि सर्वग्रास ग्रहण नहीं लगेगा और यदि दोनों मान समान हों तो समझना चाहिए कि सर्वग्रास ग्रहण का आरम्भ और अन्त एकसाथ ही होगा अर्थात् जैसे ही चन्द्रमा का पूरा बिम्ब छाया में आवेगा वैसे ही छाया के बाहर भी होने लगेगा । इस समीकरण से घ के दोनों मान नीचे लिखे सूत्र के अनुसार होंगे :— २ श. शा. ± √४श². शा² - ४ [ (चा - रा)² + शा² ] [श² - मा²] घ = ------------------------------------------------------------- २ [ (चा - रा)² + शा² ] श. शा. ± √श². शा² - [ (चा - रा)² + शा² ] [श² - मा²] = --------------------------------------------------- (चा - रा)² + शा² घ के इन दोनों मानों के योग का आधा श. शा = --------------------- (चा - रा)² + शा² यही ग्रहण का मध्यकाल है, अर्थात् पूर्णिमान्त के इतने ही समय उपरान्त ग्रहण का मध्य होता है । सूर्य, चन्द्रमा के विषुवांश और क्रान्ति से भी ग्रहण का स्पर्श काल, सम्मीलन- काल इत्यादि जानने की रीति है जो उपर्युक्त रीति से बहुत कुछ मिलती-जुलती है परन्तु वह विस्तार भय से यहां नहीं लिखी जायगी । यहां यह बतला देना आवश्यक समझ पड़ता है कि सूर्य-सिद्धान्त में स्पर्श काल और मोक्ष काल इत्यादि के जानने का जो नियम दिया गया है उससे सिद्ध होता है कि ग्रहण का मध्य काल पूर्णिमा के अन्त में होता है परन्तु ऊपर बतलायी गयी दूसरी रीति में ग्रहण का मध्य काल पूर्णिमान्त के कुछ उपरान्त आता है । दूसरी रीति बिलकुल शुद्ध है और पहली कुछ स्थूल । इसका कारण चित्र ६८ से स्पष्ट हो जाता है । ग्रहण का मध्यकाल उस समय होता है जिस समय चन्द्रमा भूभा से निकटतम अन्तर अर्थात् फ पर होता है जब कि छ फ चन्द्रमा की कक्षा पर लम्ब होता है । ऐसी दशा में चन्द्रमा का शर पूर्णिमान्त काल के शर से कुछ छोटा होता है और चन्द्रमा भी पूर्णिमान्त काल के स्थान च से कुछ आगे बढ़ा रहता है । यह जानना कि ग्रास का परिमाण स्पर्शकाल से किस समय पर कितना होता है— इष्टनाडीविहीनेन स्थित्यर्धेनार्कचन्द्रयोः । भुक्त्यन्तरं समाहन्यात् षष्ठ्याप्ताः कोटिलिप्तिकाः ॥१८॥ भानोग्रहं कोटिलिप्ता मध्यात्स्थित्यर्ध सङ्गुणाः । स्फुटस्थित्यर्धसम्भक्ताः स्फुटाः कोटिकलाः स्मृताः ॥१९॥