सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७४ सूर्य-सिद्धान्त ग्रास = म - √ [ { (स्थि — घ) × चा — रा / ६० }² + श² } जहाँ स्थ स्थित्यर्थ के लिए, श चन्द्रमा के तात्कालिक शर के लिए और चा - रा सूर्य चन्द्रमा के दैनिक गतियों के अन्तर लिए लिखा गया है। यदि चा - रा प्रति घटी का अन्तर हो तो ६० से भाग देने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। सूर्य ग्रहण के सम्बन्ध की बात आगे आनेवाले सूर्य ग्रहणाधिकार में बतलाई जायगी। मध्य ग्रहण के उपरान्त परन्तु मोक्षकाल से कुछ घड़ी पहले ग्रास का परिमाण— मध्यग्रहणतश्चोर्ध्वम् इष्टनाडीर्विशोधयेत् । स्थित्यर्धान्मौक्षिकात्तच्छेषात् प्राग्वच्छेषस्तु मौक्षिके ॥२१॥ अनुवाद—(२१) जब यह जानना हो कि मध्य ग्रहण के उपरान्त मोक्षकाल से कुछ घड़ी पहले ग्रास का परिमाण क्या है तब मोक्षकाल सम्बन्धी स्थित्यर्ध से इष्ट घड़ी घटाकर जो शेष बचे उससे ऊपर के १८-२० श्लोकों में बतलायी गयी रीति के अनुसार ग्रासमान निकाले। इससे यह जाना जायगा कि मोक्षकाल से इष्ट घड़ी पहले चन्द्रमा का कितना ग्रस्त भाग शेष है। विज्ञान भाष्य—यह नियम १८-२० श्लोकों में बतलाये गये नियम के समान है। उससे यह जाना जाता है कि इष्टकाल में कितना भाग ग्रस्त हो जाता है और इससे यह जाना जाता है कि इष्टकाल में कितना ग्रस्त भाग शेष रहता है क्योंकि मध्य ग्रहण के पहले जिस क्रम से ग्रस्त भाग की वृद्धि होती है, मध्यग्रहण के उपरान्त ठीक उसके विलोम क्रम से ग्रस्त भाग की क्षीणता होती है। ग्रास का परिमाण ज्ञात हो तो इष्टकाल जानना— ग्राह्यग्राहक्योगार्थात् प्रोज्झ्य संछन्नलिप्तिकाः । तद्वर्गात्प्रोज्झ्य तत्कालविक्षेपस्य कृतिं पदम् ॥२२॥ कोटिलिप्ता रवेः स्पष्टस्थित्यर्थेनाहता हृताः । मध्येन कोटिलिप्ताभिस्स्थितिवद्द्ग्रासनाडिकाः ॥२३॥ अनुवाद—(२२) मानैक्य खंड से ग्रस्त भाग की कला को घटाकर शेष का वर्ग करो और इसके वर्ग से चन्द्रमा के तात्कालिक शर के वर्ग को घटा दो और शेष का वर्गमूल निकालो तो (२३) कोटिलिप्ता का मान ज्ञात होगा। सूर्यग्रहण में इस कोटिलिप्ता को स्पष्ट स्थित्यर्ध से गुणा करके गुणनफल को मध्यम स्थित्यर्ध से भाग देने पर जो आता है वह कोटिकला है। इसी कोटिकला से स्थित्यर्धकाल जानने की रीति