भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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४७६ सूर्य-सिद्धान्त छाद्य ग्रह के पूर्व या पच्छिम विन्दु से जितने कोण पर क्रान्तिवृत्त उत्तर या दक्षिण होता है उसी को स्फुटवलन कहते हैं । ग्रह बिम्ब का पूर्व और पच्छिम विन्दु इस प्रकार जाना जाता है—ग्रह के केन्द्र से क्षितिज के उत्तर-दक्षिण विन्दुओं को जाता हुआ एक महावृत्त खींचते हैं जिसे उस ग्रह का समप्रोतवृत्त (circle of position) कहते हैं । यह समप्रोतवृत्त सममण्डल से १ समकोण बनाता है । सममण्डल के समानान्तर ग्रह बिम्ब के केन्द्र से जो ऊर्ध्व वृत्त खींचा जाता है वह भी समप्रोतवृत्त से समकोण पर होता है । यह ऊर्ध्ववृत्त ग्रह-बिम्ब के किनारे के जिन विन्दुओं पर काटता है उनमें से जो पूर्व की ओर होता है उसे ग्रह का पूर्व विन्दु और जो पच्छिम की ओर होता है उसे ग्रह का पच्छिम विन्दु कहते हैं । चित्र १०१ से यह सब बातें स्पष्ट होती हैं । चित्र १०१ से सिद्ध है कि क्रान्तिवृत्त क्र ग क्रा ग्रह बिम्ब के प्राच्य विन्दु से पु ग क्र कोण के अन्तर पर है । इसी अन्तर को स्फुटवलन कहते हैं । यह जानने के

चित्र १०१ उ ध ख द = इष्ट स्थान का यामोत्तर वृत्त उ पू द = इष्ट स्थान का क्षितिजवृत्त (पूर्वार्ध) १. देखो त्रिप्रश्नाधिकार पृष्ठ २२८