भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 506, कुल 838 में से

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पृष्ठ 506

चन्द्रग्रहणाधिकार ४८१ आक्षवलन और आयनवलन दोनों की दिशाएँ एक ही हों तो जोड़ने से और भिन्न हों तो इनके अन्तर से स्पष्ट वलन का परिमाण ज्ञात होता । यह चित्र १०१ से ही स्पष्ट है । आक्षवलन और आयनवलन के सूत्रों से यह भी निश्चय किया जा सकता है कि इनके मान किस समय सबसे अधिक और किस समय शून्य हो सकते हैं। उदाहरण के लिए आयनवलन के सूत्रों को लीजिए । इस समीकरण के दाहिनी ओर ३ गुणक हैं जिनमें परमक्रान्ति ज्या अचल है परन्तु ग्रह की भोगांश कोटि ज्या और क्रान्ति कोटि ज्या चल हैं । जिस समय भोगांश शून्य होगा उस समय ग्रह वसंत संपात पर होगा इसलिए इसकी क्रान्ति भी शून्य होगी । ऐसी दशा में इनकी कोटि ज्याओं का मान २ होगा । इसलिए आयनवलन परम क्रान्ति के समान अर्थात् २३°२७' होगा । यही बात शरद् सम्पात पर भी होगी । यही बात भास्कराचार्य जी ने गोलाध्याय के ग्रहण वासना के ३०वें श्लोक में लिखी है । इसी प्रकार जब भोगांश ६०° या २७०° होगा तब भोगांश कोटि ज्या शून्य होगी परन्तु क्रान्ति कोटि ज्या शून्य नहीं होगी क्योंकि क्रान्ति २४° के लगभग होगी इसलिए आयन वलन भी शून्य होगा इत्यादि । यहाँ तक तो यह बतलाया गया कि स्फुट वलन का परिमाण अंशों या कलाओं में कैसे जाना जाता है। यदि यह जानना हो कि चित्र खींचते समय अंगुल से नाप कर कैसे काम लिया जाय तो स्फुट वलन की ज्या को ७० से भाग देने पर अंगुलों में वलन का परिमाण आ जाता है । ऐसा २५ वें श्लोक में बतलाया गया है । इसकी उपपत्ति यह है कि छाद्य ग्रह के बिम्ब का चित्र खींचने के लिए ४६ अंगुल का व्यासार्ध मानकर वृत्त खींचने की परिपाटी थी । यह १२ अंगुल के शंकु के चौगुने के लगभग होता है और इस प्रकार एक अंगुल ७० कला के लगभग होता है क्योंकि त्रिज्या का मान साधारणतः ३४३८ कलाओं का समझा जाता है और ४६ × ७० = ३४३०, जो ३४३८ के बहुत निकट है । अंगुलों में बिम्ब का मान जानना — सोन्नतं दिनमानार्धं दिनार्धाप्तफलेन तु । छिन्द्याद्विक्षेपमानानि तान्येषामङ्गुलानि तु ॥२६॥ अनुवाद — (२६) इष्ट समय में छाद्य ग्रह का जो उन्नत काल हो उसको दिनमान और दिनार्धमान के योग में जोड़ कर योगफल को दिनार्धमान से भाग दे दो । इस भागफल से विक्षेप, छाद्य और छाद्यक ग्रहों के कलात्मक बिम्बों को भाग दे देने से इनके बिम्बों के अंगुलात्मक मान ज्ञात हो जायेंगे ।

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