सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ सूर्य सिद्धान्त १ २ ३ ४ ५ बुध +५६.१ +५.२१ -३.६ : +•११०४ गुरु +५६.६ +६.६५ -३.१ +•२७ शुक्र +४७.० -३.२४ -१३.० +•१६०५ शनि +६६.६ +१६.३१ +६.६ +•०११७ मंगल का पात +२५.० -२५.२२ -३५.० -०.०६४२ बुध ,, +४०.२ -१०.०७ -१६.८ -•१४६४ गुरु ,, +३४.३ -१५.६० -२५.७ -•०५२२ शुक्र ,, +२६.७ -२०.५० -३०.३ -•२७०६ शनि ,, +३०.७ -१६.५४ -२६.३ -•१८६६ इस सारिणी के ४थे और ५वें स्तम्भों में बहुत अन्तर है । परन्तु यहाँ यह ध्यान रखना चाहिये कि ५वें स्तम्भ में जो कुछ लिखा गया है वह कोरी आंख से और स्थूल यंत्रों से जाना गया है । यदि इन सिद्धान्तों के मानों की तुलना यूनानियों के मानों से की जाय तो जान पड़ेगा कि हमारे सिद्धान्तकार कितनी सूक्ष्म परीक्षा करते थे (देखिए ३५वें पृष्ठ की सारिणी) । ४थे और ७वें स्तम्भों के अंकों को मिलाने से जान पड़ेगा कि हमारे सिद्धान्त- कार वास्तविक स्थिति से कितना निकट थे और टालमी कितनी दूर । केरोपन्त ने जो गणना की है वह आधुनिक मानों के अनुसार है, इसलिए इनकी गणना से मन्दोच्चों और पातों की वास्तविक स्थिति का पता लगता है । इस तुलना से यह भी प्रकट है कि हमारे सिद्धान्तकारों ने स्वतंत्र अनुभव से इन सब भगण-मानों को जाना था न कि यूनानियों या अन्य देशवालों से लिया था जैसा कि कुछ पाश्चात्य विद्वानों का मत है । षण्मनूनां च संपिण्ड्य कालं तत्सन्धिभिस्सह । कल्पादिसन्धिन सार्धं वैवस्वतमनोस्तथा ॥४५॥ युगानां त्रिघनं यातं तथा कृतयुगं त्विदम् । प्रोज्झ्य सृष्टेस्ततः कालं पूर्वोक्तं दिव्यसंख्यया ॥४६॥ सूर्याब्दसंख्यया ज्ञेयाः कृतस्याऽन्ते गता अमी । खचतुष्टयसप्ताद्रयग्निशरनन्दनिशाकराः ॥४७॥ अनुवाद—(४५) छः मनुओं, उनकी छः सन्धियों और कल्प की आदि संधि के काल को जोड़कर योगफल में वैवस्वत मनु के (४६) २७ युगों को तथा इस (अट्ठाईसवें) सत्ययुग को जोड़ दो और उसमें से सृष्टि के रचने में (२४वें श्लोक में) पहले कहे के अनुसार जितना समय लगा है उसको घटा दो । (४७) जो शेष बचे