भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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५४६ सूर्य-सिद्धान्त यथादिशं प्राग्ग्रहणं वलनं हिमदीधितेः । मौक्षिकं तु विपर्यस्तं विपरीतमिदं रवेः ॥५॥ वलनाग्रान्नेयेन्मध्यं सूत्रं तद्यत्र संस्पृशेत् । तत्समासे ततो देयौ विक्षेपौ ग्रासमोक्षिकौ ॥६॥ विक्षेपाग्रात् पुनस्सूत्रं मध्यविन्दुं प्रवेशयेत् । तद्द्ग्राह्यवृत्तसंस्पर्शे ग्रासमोक्षौ विनिर्दिशेत् ॥७॥ नित्यशोऽर्कस्य विक्षेपाः परिलेखे यथादिशम् । विपरीतं शशाङ्कस्य तद्दशादथ मध्यमम् ॥८॥ वलनं प्राङ्मुखं नेयं तद्विक्षेपैकता यदि । भेदे पश्चान्मुखं नेयम् इन्दोर्भानो विपर्ययात् ॥६॥ वलनाग्रात्पुनस्सूत्रं मध्यविन्दुं प्रवेशयेत् । मध्यात्सूत्रेण विक्षेपं वलनाभिमुखं नयेत् ॥१०॥ विक्षेपाग्रालिखेद् वृत्तं ग्राहकार्धेन तेन यत् । ग्राह्यवृत्तं समाक्रान्तं तद्ग्रस्तं तमसा भवेत् ॥११॥ छेद्यकं लिखितं भूमौ फलके वा विपश्चिता । विपर्ययो दिशां ग्राह्यः पूर्वापर कपालयोः ॥१२॥ अनुवाद — (२) अच्छी तरह शोधी हुई समतल भूमि पर एक विन्दु स्थिर करके और उसी को केन्द्र मानकर ४६ अंगुल के व्यासार्ध का एक वृत्त खींचो । इसे वलनाश्रित वृत्त कहते हैं । (३) उसी केन्द्र से एक दूसरा वृत्त भी खींचो जिसका व्यासार्ध छाद्य और छाद्यक विम्बों के व्यासार्धों के योग के अर्थात् मानैक्यखंड के समान हो । इस वृत्त को समास वृत्त कहते हैं । इसी तरह उसी केन्द्र से एक तीसरा वृत्त भी खींचो जिसका व्यासार्ध उस ग्रह के बिम्ब के व्यासार्ध के समान हो जिस पर ग्रहण लगता है । (४) इसी विन्दु से होती हुई उत्तर-दक्षिण-रेखा तथा पूर्व-पश्चिम- रेखा पहले (त्रिप्रश्नाधिकार श्लो० ३, ४ में) बतलाई हुई रीति के अनुसार खींचो । चन्द्रग्रहण में स्पर्श पूर्व दिशा से और मोक्ष पश्चिम दिशा से होते हैं परन्तु सूर्यग्रहण में इसके विपरीत होता है अर्थात् सूर्यग्रहण में स्पर्श पच्छिम से और मोक्ष पूर्व से होता है । (५) चंद्रग्रहण में चंद्रमा के स्पर्शकालिक स्फुट वलन की ज्या जितनी हो पूर्व विन्दु से उतने ही अंतर पर और उसी दिशा में जिस दिशा का स्फुट वलन हो केन्द्र से वलनाश्रित वृत्त तक एक रेखा खींचो । इसी प्रकार चन्द्रमा के मोक्षकालिक स्फुट- वलन की ज्या जितनी हो, पच्छिम विन्दु से उतने ही अन्तर पर परन्तु स्फुटवलन की दिशा की विपरीत दिशा में केन्द्र से वलनाश्रित वृत्त तक एक दूसरी रेखा खींचो । सूर्यग्रहण में उपर्युक्त रेखाओं की दिशाओं का क्रम उनके विपरीत होता है जो

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