भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 573

५४८ सूर्य-सिद्धान्त (१२) ज्योतिषी को चाहिए कि समतल भूमि पर अथवा फलक (काठ के तख्ते) पर परिलेख बनावे । पूर्व कपाल में दिशाओं का जो क्रम रहता है उसके विपरीत पच्छिम कपाल में होना चाहिए अर्थात् पूर्व कपाल में जहां लब्ध क्रम--पूर्व, दक्षिण, पच्छिम और उत्तर दिशाएँ होंगी वहां पच्छिम कपाल में क्रमानुसार पच्छिम, उत्तर, पूर्व और दक्षिण दिशाएं होंगी । विज्ञान भाष्य—इन श्लोकों में ग्राह्य बिम्ब को स्थिर मानकर उसके जितने अंतर पर और जिस दिशा में ग्राहक का केन्द्र ग्रहण के स्पर्श, मध्य और मोक्ष काल में होता है उसको रेखागणित की सहायता से जानने की रीति बतलायी गयी है। चंद्रग्रहण में चन्द्रमा ग्राह्य और भूछाया ग्राहक होती है। सूर्य ग्रहण में सूर्य ग्राह्य और चन्द्रमा ग्राहक होता है। अब श्लोकों के क्रम से प्रत्येक रीति की व्याख्या की जाती है :— श्लोक २—चंद्रग्रहणाधिकार श्लोक २४-२५ तथा पृष्ठ ४७५-४८० में बतलाया गया है कि स्फुटवलन क्या है और इससे क्रान्तिवृत्त का ज्ञान कैसे होता है। वहाँ यह भी बतलाया गया है कि स्फुटवलन की ज्या को ७० से भाग देने पर इसकी ज्या का परिमाण अंगुलों में आ जाता है। इस प्रकार विज्या का मान ४६ अंगुल के लगभग होता है क्योंकि त्रिज्या ३४३८ कलाओं की होती है जिसको ७० से भाग देने पर लब्धि ४६.१ आती है जिसे पूर्णाङ्कों में ४६ ही समझना चाहिए । इसीलिए इस श्लोक में ४६ अंगुल के व्यासार्ध का वलनाश्रित वृत्त खींचने की रीति बतलायी गयी है। इस वृत्त से स्फुटवलन बतलानेवाली रेखा सहज ही खींची जा सकती हैं। भास्कराचार्य तथा अन्य आचार्यों ने वलनाश्रित वृत्त के खींचने का नियम नहीं बतलाया है। उन्होंने केवल इतना लिखा है कि समासवृत्त पर पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चिन्ह बनाकर स्फुटवलन के परिमाण का कोण दिशा के अनुसार बना लेना चाहिए । श्लोक ३—इस श्लोक में समासवृत्त और जिस ग्रह में ग्रहण लगता है उसके बिम्ब का वृत्त अर्थात् ग्राह्य-विम्ब वृत्त के खींचने की बात है । पर यह स्पष्ट नहीं बतलाया गया है कि इसका परिमाण क्या होना चाहिए । यदि ७० कलाओं का एक अंगुल माना जायगा तो समास-वृत्त और ग्राह्य-विम्ब-वृत्त बहुत छोटे होंगे क्योंकि ग्राह्य-बिम्बवृत्त का व्यासार्ध १६ कला अथवा एक अंगुल के चौथे भाग से भी कम होता है और समास-वृत्त का व्यासार्ध १ अंगुल के लगभग होता है। इसलिए इन वृत्तों के लिए ७० कलाओं का एक अंगुल मानते में सुविधा नहीं होगी । ऐसी दशा में चंद्रग्रहणा- धिकार के २६ वें श्लोक में जिस अंगुल की चर्चा है उसे काम में लाना चाहिये ।