सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिलेखाधिकार ५६५ उ पू द प = वलनाश्रित वृत्त उ, पू, द, प, = उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पच्छिम विन्दु स वि वी मा = समासवृत्त जिसका व्यासार्ध मानैक्य खंड के समान है सबसे छोटा वृत्त = चन्द्रविम्ब च = चन्द्रविम्ब, समास वृत्त और वलनाश्रित वृत्त का केन्द्र च व = वलनाग्र रेखा अथवा वलनाश्रितवृत्त की त्रिज्या जिसका पूर्व विन्दु से अन्तर स्पर्शकाल के स्फुट वलन की ज्या पू क के समान है पू च व = स्पर्शकालिक वलन व = स्पर्शकाल का वलनाग्र विन्दु स = स्पर्शकाल की वलनाग्र रेखा और समासवृत्त का युतिविन्दु स वि = स्पर्शकालिक चन्द्रविक्षेप या शर । यह वलनाग्र रेखा के दक्षिण की ओर खींचा गया है क्योंकि चन्द्रशर उत्तर है और यह परिलेख चन्द्रग्रहण का है (श्लोक ८) वि = स्पर्शकालिक विक्षेपाग्र विन्दु अथवा स्पर्शकालिक भूछाया का केन्द्र वि च = स्पर्शकालिक विक्षेपाग्र रेखा सा = विक्षेपाग्र रेखा और चन्द्रविम्ब का युति-विन्दु अथवा ग्रहण का स्पर्श विन्दु द च वा = मध्यग्रहणकालिक वलन च वा = मध्यग्रहणकालिक वलनाग्र रेखा (श्लोक ६) च म = च वा रेखा पर मध्यग्रहणकालिक चन्द्र विक्षेप (श्लोक १०) म = मध्य ग्रहण काल में भूछाया का केन्द्र । इसको केन्द्र मानकर भूछाया के व्यासार्ध से जो वृत्त खींचा जाता है उसी से मध्यकालिक या परम ग्रास का परिमाण जाना जाता है । प च वू = मोक्षकालिक वलन च वू = मोक्षकालिक वलनाग्र रेखा मा = मोक्ष काल की वलनाग्र रेखा और समास वृत्त का युतिविन्दु मा वी = मोक्षकालिक चन्द्र विक्षेप । यह भी वलनाग्र रेखा के दक्षिण की ओर खींचा गया है च वी = मोक्षकालिक विक्षेपाग्र रेखा मी = मोक्षकालिक विक्षेपाग्र रेखा और समासवृत्त का युतिविन्दु अथवा ग्रहण का मोक्षविन्दु वी = मोक्षकालिक भूछाया का केन्द्र