सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहयुत्यधिकार ५८३ समप्रोतवृत्त पर होते हैं अर्थात् उस वृत्त पर होते हैं जो दोनों ग्रहों से होता हुआ क्षितिज के उत्तर बिन्दु पर जाता है । इसलिए स्पष्ट युक्तिकाल जानने के लिए पहले दी हुई रीति से ग्रहों के जो भोगांश आते हैं उसमें दो संस्कार किये जाते हैं जिनके नाम आक्षदृक्कर्म और आयनदृक्कर्म हैं । यह संस्कार आक्षवलन और आयनवलन के सदृश हैं । भास्कराचार्यजी ने तो ब्रह्मगुप्तजी के अनुसार आक्षवलन और आयनवलन से ही आक्षदृक्कर्म और आयनदृक्कर्म निकालने की रीति बतलायी है जो आजकल अधिकतर प्रचलित है परन्तु सूर्यसिद्धान्त में इस कार्य के लिए दूसरी ही रीति दी है । यहाँ पहले सूर्यसिद्धान्त की रीति समझाकर संक्षेप में यह भी बतलाया जायगा कि भास्कराचार्य की रीति कैसी है । चित्र १०६ से प्रकट होता है कि इस अध्याय के छठें श्लोक तक युक्तिकाल के ग्रहों के भोगांश जानने की जो रीति दी हुई है उसके अनुसार ग और घ ग्रहों का जो भोगांश होगा वह क्रान्तिवृत्त के य विन्दु के भोगांश के समान होगा । परन्तु इस समय इन ग्रहों के समप्रोतवृत्त क्रान्तिवृत्त को ज और प विन्दुओं पर काटते हैं इसलिए उपर्युक्त युक्तिकाल में इन ग्रहों के समप्रोत वृत्तों का अंतर क्रान्तिवृत्त पर प ज के समान होगा । सिद्धान्तानुसार जिस समय यह अन्तर शून्य के समान हो उस समय को युतिकाल कहते हैं अर्थात् दो ग्रहों की युति उस समय होती है जिस समय दोनों ग्रह एक ही समप्रोतवृत्त पर हों । यह जानने के लिए पहले यह क्रिया करनी पड़ती है कि दोनों ग्रहों के भोगांश एक कब होंगे जो ४-६ श्लोकों के अनुसार जाना जाता है । इसके बाद यह जानना पड़ता है कि उस समय य प और य ज क्या हैं । इनको मैं सुविधा के लिए क्रमशः ग और घ के आक्ष-आयन-दृक्कर्म-संस्कृत-फल कहूँगा । यह प्रकट है कि— प्रत्येक समीकरण के दाहिने पक्ष में जो दो पद हैं उनका मान सहज ही जाना जा सकता है और इस प्रकार य प और य ज के मान भी जाने जा सकते हैं । पहले पद के जानने की रीति ७-६ श्लोकों में बतलायी गयी है और इसका नाम आचार्यों ने आक्षदृक्कर्म रखा है । दूसरे पद के जानने की रीति १०वें श्लोक में बतलायी गयी है और इसका नाम आचार्यों ने आयनदृक्कर्म रखा है । पहले को आक्षदृक्कर्म कहा गया है क्योंकि इसका परिमाण द्रष्टा के अक्षांश के अनुसार बदलता है और दूसरे को आयनदृक्कर्म कहा गया है क्योंकि इसका परिमाण अयनान्तवृत्तों (देखो पृष्ठ २३०) के अनुसार बदलता है जैसा कि आगे सिद्ध किया जायगा । आक्षदृक्कर्म—यह प्रकट है कि निरक्ष देश पर क्षितिज का उत्तर बिन्दु उ और ध्रुव घ एक हो जाते हैं इसलिये यहां किसी ग्रह के समप्रोतवृत्त और ध्रुवप्रोत-