सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टम अध्याय नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार (संक्षिप्त वर्णन) [ श्लोक १—नक्षत्रों के भोग से उनके ध्रुव कैसे जाने जाते हैं। श्लोक २-६- नक्षत्रों के भोग और विक्षेपों के मान । श्लोक १०, ११ और १२ का पूर्वार्ध—अगस्त्य, मृगव्याध, अग्नि और ब्रह्म-हृदय नामक तारों के भोग, ध्रुव और विक्षेप । श्लोक १२ का उत्तरार्ध—ध्रुव और विक्षेप को परीक्षा करने की रीति । श्लोक १३—रोहिणी-शकट भेद कब हो सकता है। श्लोक १४-१५—तारे के साथ ग्रह की युति का काल और स्थान जानने की रीति । श्लोक १६-१६—नक्षत्र पुंजों का कौन तारा योगतारा है। श्लोक २०-२१—प्रजापति, अपाम्वत्स और आप ताराओं के ध्रुव और विक्षेप । ] इस अधिकार में यह बतलाया गया है कि सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहों के मार्ग में कौन-कौन नक्षत्र पुंज पड़ते हैं, उनके स्थान कहाँ हैं और ग्रहों के साथ उनके मुख्य तारे अथवा योगतारे की युति का समय कैसे जाना जाता है। कुछ ऐसे तारों की भी चर्चा आ गयी है जो अत्यन्त प्रतिभावान होने के कारण प्राचीनकाल के साहित्य में विशेष स्थान रखते हैं, परन्तु जिनके साथ ग्रहों की युति नहीं होती । परन्तु ऐसे सब तारों या तारापुंजों की चर्चा यहाँ मालूम नहीं क्यों नहीं की गयी। मैं परिशिष्ट में ऐसे तारों या तारापुंजों की भी चर्चा करूँगा जो इस अधिकार में नहीं दिये गये हैं परन्तु प्राचीन साहित्य में आये हैं अथवा विशेष महत्व रखते हैं जैसे सप्तर्षि, काश्यप मंडल, इत्यादि । इन ताराओं के विषय में आजकल नवीन वेधों से जो कुछ मालूम हुआ है वह भी संक्षेप में वहीं दिया जायगा । प्रोच्यते लिप्तिका भानां स्वभोगेन दशाहताः । भवन्त्यतीतधिष्ण्यानां योगलिप्तायुता ध्रुवाः ॥१॥ अनुवाद- (१) अश्विनी आदि तरीकों के जो भोग आगे कहे जाते हैं उनको दस से गुणा करके गुणनफल को गत नक्षत्रों की भोग-कलाओं में जोड़ने से जो आता है वही उन तारों के ध्रुव हैं । विज्ञानभाष्य—इस श्लोक के पूर्वार्ध में जो स्वभोग शब्द आया है उसका