भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 631

६०६ सूर्य-सिद्धान्त अर्थ भोगांश नहीं है और न इसका परिमाण अंशों या कलाओं में ही है। तारे के स्वभोग का अर्थ है तारे का अपने नक्षत्र के आदि विन्दु से अन्तर। यह अन्तर ऐसी इकाई में है जिसको न तो अंश कह सकते हैं और न कला । इसीलिए यह बतलाया गया है कि यदि इस स्वभोग को दस से गुणा किया जाय तो इसका परिमाण कलाओं में मालूम होता है। ऐसा जान पड़ता है कि प्रचलित इकाइयों से भिन्न इकाई का प्रयोग संक्षेप के लिए किया गया है। दस से गुणा करने पर जो आता है वही तारे की अपने नक्षत्र के आदि बिन्दु से कलाओं में दूरी होती है। इस दूरी को गत नक्षत्रों की भोग-कलाओं में जोड़ने से अश्विनी के आदि बिन्दु से अर्थात् राशि-चक्र के आदि विन्दु से उक्त तारे का ध्रुव कलाओं में जाना जाता है। पहले बतलाया गया है कि अश्विनी के आदि विन्दु से किसी ग्रह का क्रान्तिवृत्त पर जो अन्तर होता है वह भोगांश कहलाता है और क्रान्तिवृत्त से उस ग्रह का कदम्ब-प्रोतवृत्त पर जो अन्तर होता है वह विक्षेप कहलाता है। परन्तु यहाँ भोगांश न कहकर ध्रुवांश या ध्रुव कहा गया है। यह चित्र ११० से स्पष्ट हो जाता है। यदि त तारे से जाते हुए कदम्बप्रोतवृत्त और ध्रुवप्रोतवृत्त खींचे जायें तो ये क्रान्तिवृत्त पर दो भिन्न विन्दुओं पर मिलते हैं। क्रान्तिवृत्त के जिस विन्दु ति पर कदम्बप्रोतवृत्त मिलता है उससे अश्विनी के आदि का जो अन्तर होता है उसे तारे का भोग अथवा कदम्बाभिमुख भोग कहते हैं। जैसा कि पहले के अध्यायों में बतलाया गया है और इसी विन्दु से तारे के अन्तर तति को विक्षेप या शर कहते हैं। जिसे यहाँ कदम्बाभिमुख विक्षेप कहना अधिक उपयुक्त होगा परन्तु इस अध्याय में भोग और विक्षेप दूसरे अर्थ में प्रयोग किये गये हैं। भोग का अर्थ कदम्बाभिमुख भोग नहीं है वरन् ध्रुवाभिमुख भोग है और आगे जिस विक्षेप की चर्चा की गयी है उसका अर्थ कदम्बाभिमुख विक्षेप नहीं वरन् ध्रुवाभिमुख विक्षेप है। यह बात चित्र के नीचे जो विवरण दिया है उससे और भी स्पष्ट हो जाती है। एक ही परिभाषिक शब्द से दो भिन्न अर्थ प्रकट करने में भ्रम हो जाता है इसलिये इसको अच्छी तरह ध्यान में रखना चाहिये । ग्रहयुत्यधिकार में यह बतलाया गया है कि ग्रहों के भोगों और विक्षेपों में आयन दृक्कर्म और आक्षदृक्कर्म दो संस्कार करने पड़ते हैं। ग्रहों के भोग में आयन दृक्कर्म का संस्कार करने से जो आता है वही ग्रह का ध्रुवाभिमुख भोग अथवा ध्रुव होता है। इसलिए जब इस अध्याय में ग्रहों का ध्रुवाभिमुख भोग ही लिखा गया है, तब नक्षत्रों के साथ आयनदृक्कर्म की आवश्यकता न पड़ेगी, केवल आक्षदृक्कर्म की आवश्यकता पड़ेगी जैसा कि इसी अध्याय के १४वें श्लोक में बतलाया गया है। इस