सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशृङ्गोन्नत्यधिकार ६६५ कोटिकर्णयुतेरिन्दोः बिम्बं तात्कालिकं लिखेत् । कर्णसूत्रेण दिश्वसिद्धिं प्रथमं परिकल्पयेत् ॥१२॥ शुक्लं कर्णेन तद्विम्बद्योगावन्तर्मुखं नयेत् । शुक्लाग्रयाम्योत्तरयो र्मध्ये मत्स्यौ प्रसाधयेत् ॥१३॥ तन्मध्यसूत्रसंयोगाद् बिन्दुं त्रिस्पृग्लिखेद्धनुः । प्राग्विम्बं यावद्गेव स्यात्तादृक् तत्र दिने शशी ॥१४॥ कोट्या दिक्साधनात्तिर्यक् शुक्लं तच्छृङ्गमुन्नतम् । दर्शयेदुन्नतां कोटिं कृत्वा चन्द्रस्य साऽऽकृतिः ॥१५॥ कृष्णे षड्भयुतं सूर्य विशोध्येन्दोस्तथाऽसितम् । दद्याद्धामं भुजं तत्र पश्चिमे मण्डलं विधोः ॥१६॥ अनुवाद—(१०) समतल भूमि में सूर्य को सूचित करनेवाला विन्दु लिखकर इससे भुजकी दिशा में भुज के समान रेखा खींचकर इसके अग्र विन्दु से पच्छिम की ओर १२ अंगुल की कोटि रेखा खींचे और इस कोटि रेखा के अग्रविन्दु को सूर्य को सूचित करनेवाले विन्दु से मिलाकर कर्ण खींचे । (११) कोटि और कर्ण के संपात- विन्दु को केन्द्र मान कर तात्कालिक चंद्रबिम्ब के समान एक वृत्त बनावे । पहले इसकी परिधि पर कर्ण रेखा के आधार पर दिशाओं के चिह्न बनावे । (१२) कर्ण रेखा और चन्द्रबिम्ब के सम्पात विन्दु से केन्द्र की ओर कर्ण-रेखा पर चन्द्रमा के शुक्ल भाग का चिह्न बनावे । इस चिह्न और चन्द्रबिम्ब के उत्तर दक्षिण विन्दुओँ से दो मत्स्य बनावे । (१३) इन मत्स्यों के मध्य से जाने वाली रेखाओं के सम्पात विन्दु को केन्द्र मानकर एक धनु खींचे जो तीनों विन्दुओं को अर्थात् शुक्लाग्र विन्दु और उत्तर दक्षिण विन्दुओं को स्पर्श करे । इस धनु और चन्द्रबिम्ब के पूर्व भाग के बीच- में जैसा चित्र होता है वैसा ही चन्द्रमा उस दिन देख पड़ता है । (१४) अब कोटि के आधार पर चन्द्रबिम्ब की परिधि पर दिशाओं के चिह्न बनावे । कोटि रेखा से सम- कोण बनानेवाली और चन्द्रबिम्ब के जानेवाली रेखा के ऊपर शुक्ल भाग का जो शृङ्ग रहेगा वही उन्नत देख पड़ेगा और आकाश में चन्द्रमा की आकृति वैसी ही देख पड़ेगी । (१५) कृष्णपक्ष में सूर्य की राशि में ६ राशि जोड़ने से जो आवे उसे चन्द्रमा के भोगांश से घटाकर चन्द्रबिम्ब के असित अर्थात् अप्रकाशित भाग का साधन उसी प्रकार करना चाहिए । यहाँ भुज की दिशा उलटी होती है और चन्द्रबिम्ब के पच्छिम भाग में काले भाग की वृद्धि होती है । विज्ञान-भाष्य—इन श्लोकों में यह बतलाया गया है कि चन्द्रमा के शुक्ल भाग का परिलेख किस प्रकार बनाया जाता है । मान लो कागज का पृष्ठ समतल