सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाताधिकार ७०५ अनुवाद—(६) त्रिप्रश्नाधिकार में बतलायी हुई रीति से छाया सूर्य का भोगांश जानकर इससे स्पष्टाधिकार की रीति से जाने हुए स्पष्ट सूर्य को घटाकर अयनांश निकाले और यह अयनांश स्पष्ट सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों में जोड़े । अयनांश-संस्कृत सूर्य और चन्द्रमा अर्थात् सायन सूर्य और सायन चन्द्रमा के भोगांशों का जोड़ जब १२ राशि या ६ राशि हो तब इन दोनों की स्पष्ट क्रान्ति निश्चय करनी चाहिए । विज्ञान-भाष्य—यह जानने के लिए कि सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति कब समान होती है, सायन सूर्य और सायन चन्द्रमा के भोगांश जानने की आवश्यकता है इसीलिए स्पष्ट सूर्य और चन्द्रमा में अयनांश जोड़ने की विधि बतलायी गयी है । इस रीति से क्रान्ति-साम्य का जो समय आवेगा वह स्थूल होगा क्योंकि चन्द्रमा की कक्षा क्रान्तिवृत्त से भिन्न है । इस विषय की और बातें चित्र १२० के साथ ही बतला दी गयी हैं । यह जानना कि पात-काल बीत गया है या आनेवाला है— अथौजपदगस्येन्दोः क्रान्तिविक्षेपसंस्कृता । यदि स्यादधिका भानोः क्रान्तेः पातो गतस्तदा ॥७॥ ऊना चेत्स्यात्तदा भावी वामं युग्मपदस्य च । पदान्यत्वं विधोः क्रान्तिर्विक्षेपाच्चेद्विशुध्यति ॥८॥ अनुवाद—(७) सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्ति जानने के बाद यह देखना चाहिये कि चन्द्रमा वसंत-संपात से विषम पद में है या सम पद में । यदि चन्द्रमा विषम पद में हो और इसकी विक्षेप-संस्कृत क्रान्ति अर्थात् स्पष्ट क्रान्ति सूर्य की स्पष्ट क्रान्ति से अधिक हो तो समझना चाहिये कि पातकाल बीत गया है, (८) और यदि कम हो तो समझना चाहिये कि पातकाल आनेवाला है । परन्तु यदि चन्द्रमा समपद में हो तो इसका उलटा समझना चाहिये अर्थात् समपद में चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्ति सूर्य की क्रान्ति से अधिक हो तो समझना चाहिए कि पातकाल आनेवाला है और कम हो तो समझना चाहिए कि पातकाल बीत गया है । यदि चन्द्रमा के विक्षेप या शर से इसकी क्रान्ति कम हो और घटाना पड़े तो ऊपर के नियम में विषमपद के बारे में जो कुछ कहा गया है वह समपद के बारे में समझना चाहिये और समपद के बारे में जो कहा गया है वह विषमपद के बारे में समझना चाहिए । विज्ञान-भाष्य—ओज और युग्मपद अथवा विषम और समपद की चर्चा स्पष्टाधिकार पृष्ठ १२६-२७ में अच्छी तरह हुई है । यहाँ वसंत-संपात बिन्दु से सायन कर्क बिन्दु या दक्षिणायन बिन्दु तक प्रथम पद, दक्षिणायन बिन्दु से शरद सम्पात