सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२४ सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—फिर जितात्मा ब्रह्मा ने मनः कल्पितवृत्त को पहले १२ राशियों में फिर २७ नक्षत्रों में बाँटा । चराचर जगत् की उत्पत्ति— ततश्चराचरं विश्वं निर्ममे देवपूर्वकम् । ऊर्ध्वमध्याधरेभ्योऽथ गात्रेभ्यः प्रकृतिं सृजन् ॥२६॥ गुणकर्मविभागेन सृष्ट्वा प्राग्वदनुक्रमात् । विभागं कल्पयामास यथास्वं वेददर्शनात् ॥२७॥ ग्रहर्क्षताराणां भूमेः विश्वस्य वा विभुः । देवानां च मनुष्याणां सिद्धानां च यथाक्रमम् ॥२८॥ ब्रह्माण्डमेतत् सुषिरं यत्रेवं भूर्भुवादिकम् । कटाहद्वितयस्यैव संपुटं गोलकाकृतिः ॥२६॥ अनुवाद—(२६) इसके पश्चात् श्रेष्ठ, मध्यम और अधम स्रोतों से सत्व, रज और तम विभेदात्मक प्रकृति का निर्माण करके देवता, मनुष्य, राक्षस आदि चराचर विश्व की रचना की । (२७) गुण और कर्म के अनुसार पूर्वोक्त क्रम से सृष्टि रचकर वेदों में बतलायी हुई रीति के अनुसार देश काल के अनुसार इसके विभाग किये । (२८) समर्थवान् ब्रह्मा ने ग्रहों, नक्षत्रों, तारों, पृथ्वी, संसार, देवताओं, मनुष्यों और सिद्धों का यथाक्रम स्थापन किया, (२६) दो समान कड़ाहों के मुंह मिला देने से जैसा खोखला गोला बनता है उसी प्रकार के इस ब्रह्माण्ड अवकाश में भूर्भुवः आदि लोक स्थित हैं । ब्रह्माण्ड में ग्रहों की कक्षाओं का क्रम— ब्रह्माण्डमध्यपरिधि व्योमकक्ष्याऽभिधीयते । तन्मध्ये भ्रमणं भानां तदधोऽधः क्रमादथ ॥३०॥ मन्दामरेज्यभूपुत्रसूर्यशुकेन्दुजेन्दवः । परिभ्रमन्त्यधोऽधस्तात्सिद्धाविद्याधरा घनाः ॥३१॥ मध्ये समन्तादण्डस्य भूगोलो व्योम्नि तिष्ठति । बिभ्राणः परमां शक्तिं ब्रह्मणो धारणात्मिकाम् ॥३२॥ अनुवाद—(३०) ब्रह्माण्ड की परिधि को आकाश कक्षा कहते हैं जिसके भीतर नक्षत्र भ्रमण करते हैं; फिर उसके नीचे क्रमानुसार (३१) शनि, वृहस्पति, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध और चन्द्रमा भ्रमण करते हैं । इसके नीचे सिद्ध, विद्याधर