भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 783, कुल 838 में से

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पृष्ठ 783

७५८ सूर्य्य-सिद्धान्त हां, इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि जिस छत में लोलक लटकाया जाय उसमें किसी प्रकार का स्पन्दन न हो और कमरे की हवा में किसी प्रकार का झोंका न हो । लोलक लटकने पर प्रायः घूमता रहता है जिससे डोरे या तार में ऐंठन पड़ जाती है । इससे लोलक में एक दूसरी गति उत्पन्न हो जाती है । इसलिये इसे रोकने के लिये इन्होंने तार को एक पीतल के हुक में लटकाया जिसका आकार प्रश्नवाचक चिह्न की तरह था और हुक की नोक एक छिछली प्याली में थांभ दी गयी जो धरन पर अच्छी तरह कसी हुई थी । प्याली का नतोदर तल अच्छी तरह चिकना कर दिया था । लोलक को झुलाने के पहले बिल्कुल निश्चल रखना चाहिये । इसलिये गोले में एक डोरा बांध कर डोरे को इतना खींच कर दीवाल में बांध देना चाहिये कि गोला धरण-बिन्दु की लम्ब रेखा से २, ३ फुट हट जाय । अब यदि डोरे को जला दिया जाय तो गोला हिलने लगेगा और बराबर एक ही तल में झूलता रहेगा । यदि ऐसा न किया जाय तो गोला एक लम्बे दीर्घवृत्त में झूलने लगता है और यदि आरंभ में जरा सी भी गड़बड़ हो तो कुछ देर में बहुत बड़ा रूप धारण कर लेता है । लोलक के झूलने की दिशा चाहे जो हो परन्तु यदि आरम्भ उत्तर दक्षिण दिशा से किया जाय तो अच्छा है । गोले के नीचे जो सुई निकली हुई हो वह मेज के इतने पास हो कि उस पर रखी हुई कागज की तख्ती के छूने से तनिक ही बची रहे । गोला झुलाने के बाद कागज की तख्ती पर एक सीधी रेखा पेंसिल से खींच कर तख्ती को मेज पर इस प्रकार सरका दो कि सुई छू न जाय और खींची हुई रेखा सुई के झूलने के तल से ठीक मिल जाय । अब तख्ती की रेखा के दक्षिणी किनारे को ध्यान से देखना चाहिये । दो ही तीन मिनट में तख्ती की रेखा का दक्षिणी सिरा पच्छिम से पूरब को अर्थात् अपसव्य दिशा में या घड़ी की विरुद्ध दिशा में घूमता हुआ देख पड़ेगा । कारण यह कि तख्ती पृथ्वी के साथ पच्छिम से पूरब को घूमती रहती है । यह प्रयोग यदि विषुवत् रेखा से दक्षिण के देशों में किया जाय तो तख्ती की रेखा घड़ी की अनुकूल दिशा में घूमती हुई देख पड़ेगी । अब देखना है कि प्रयोग का परिणाम गणना से कहाँ तक मिलता है । यदि किसी प्रकार यह सम्भव हो कि लोलक उत्तरी ध्रुव पर लटकाया जाय तो लोलक की लम्ब-रेखा और पृथ्वी का अक्ष एक ही दिशा में होंगे । इसलिए जैसे- जैसे पृथ्वी पच्छिम से पूरब की ओर घूमती जायगी इसके साथ दर्शक के खड़ा होने का तल भी पच्छिम से पूरब को घूमेगा और लोलक का स्पन्दन तल पूरब से पच्छिम की ओर हटता हुआ जान पड़ेगा क्योंकि दर्शक पृथ्वी के घूमने को नहीं देख