भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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७६० सूर्य-सिद्धान्त यह सम्भव नहीं कि एक बार का झुलाया हुआ लोलक लगातार २४ घंटे तक झूलता रहे । परन्तु जितनी देर तक वह झूलता रहेगा उतनी ही देर में इसका स्पन्दन-तल इतना घूमा हुआ देख पड़ेगा कि उससे अनुपात द्वारा सहज ही जाना जा सकता है कि एक चक्कर लगाने का समय क्या हो सकता है । पोर्टर ने अपने लोलक को इस प्रकार लटकाया था । एक पीतल का हुक जिसकी मोटाई दे इञ्च थी एक फौलाद की प्याली में रखा गया है जिसमें ऐंठन न पड़े । (देखो चित्र १३१) यदि विषुवत् रेखा पर लोलक झुलाया जाय तो इसकी नोक से बनी हुई लकीर एक दूसरे के ऊपर होगी क्योंकि यहाँ इसके दोनों किनारों की पच्छिम से पूरब वाली गति समान है इसलिए लोलक का स्पन्दन-तल घूमता हुआ नहीं देख पड़ेगा वरन् एक ही लकीर पर चलता रहेगा । परन्तु विषुवत् रेखा से भिन्न स्थानों में यह बात नहीं होगी क्योंकि लोलक के ठीक नीचे के धरातल के उस भाग में जो विषुवत् रेखा के पास है पृथ्वी के घूमने की गति उससे अधिक है जो ध्रुव के पास है इसलिए इसका परिणाम यह होगा कि लोलक की नोक से जो लकीर बालू पर बनेगी उसका वह किनारा जो विषुवत् रेखा की ओर है ध्रुव की ओर वाले किनारे से अधिक वेग से घूमने के कारण पूरब की वि स अ ९०-अ धा ध क प वी ( चित्र नं० १३२ )