सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोलाध्याय ७६७ बंधी हुई पूरब से पच्छिम को जा रही हैं। परन्तु इन सब गतियों का कारण पृथ्वी की दैनिक गति ही है। उ व विषुवत रेखा व द (चित्र १३५) उ = उत्तर ध्रुव द = दक्षिण ध्रुव व वि = विषुवत् रेखा सकृदुद्गतमब्दार्धं पश्यन्त्यर्कं सुरासुराः । पितरः शशिगाः पक्षं स्वदिनं च नराभुवि ॥७४॥ अनुवाद—सुर और असुर एक बार के उदय हुए सूर्य को लगातार आधे वर्ष तक देखते रहते हैं, चन्द्रलोक के निवासी पितृगण उसको एक पक्ष तक और पृथ्वी के निवासी मनुष्य उसको अपने एक दिन तक देखते हैं । विज्ञान-भाष्य—इस श्लोक के पूर्वार्ध का अर्थ वही है जो ६७वें श्लोक में बतलाया गया है। उत्तरार्ध के प्रथम पद के अर्थ में ही कुछ विशेषता है जिसे समझाने की आवश्यकता है। सनातनधर्मी हिन्दुओं का विश्वास है कि चन्द्रगोल के ऊर्ध्व भाग में पितृगण निवास करते हैं। यह भाग पृथ्वी के सन्मुख नहीं होता । पाश्चात्य ज्योतिषी भी कहते हैं कि चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा इस प्रकार करता है कि इसका अधोभाग ही पृथ्वी के सन्मुख रहता है और ऊर्ध्व भाग सदैव पीछे रहता