सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमध्यमाधिकार ६१ स्फुट परिधि भी एक ही है। इन स्थानों की उत्तर-दक्षिण-रेखा (Meridian) क्रम से उ सी पी द, उ अ ल द, उ स प द और उ सा पा द हैं। यदि उ अ ल द रेखा पर अ अवन्ती (उज्जैन) और ल लंका के स्थान हों तो इसको भारतवर्ष की मध्य रेखा (standard meridian) कहेंगे; जैसे आजकल ग्रीनविच से जाने वाली उत्तर- दक्षिण-रेखा यूरोप और अमेरिका वालों की भूमध्य रेखा कही जाती है। किसी स्थान की स्फुट परिधि का वह खंड जो उस स्थान की उत्तर-दक्षिण-रेखा और मध्य रेखा के बीच में पड़ जाता है उस स्थान का देशान्तर (योजनों में) (Difference of longitude in yojan) कहलाता है, जैसे स का देशान्तर स अ, सा का देशान्तर सा अ और सी का देशान्तर सीअ हुए। इसी तरह प का देशान्तर प ल, पा का देशान्तर पा ल और पी का देशान्तर पी ल हुए। चित्र से यह भी स्पष्ट है कि यद्यपि प, स एक ही उत्तर-दक्षिण रेखा पर है तथापि प, स के देशान्तर (योजनों में) समान नहीं है क्योंकि स की स्फुट परिधि प की स्फुट परिधि (भूपरिधि) से छोटी है। यदि इसी रेखा पर कोई स्थान क हो तो इसका देशान्तर क का (योजनों में) और भी छोटा होगा। ६०वें श्लोक में देशान्तर का शब्द इसी परिभाषा के अनुसार प्रयुक्त हुआ है। परन्तु यह परिभाषा सरल तथा व्यवहारोपयोगी नहीं है। आगे चलकर ६४वें श्लोक में देशान्तर नाड़ी की चर्चा है। यह भी देशान्तर की एक परिभाषा है जो सरल है; इसलिए इस जगह उसको भी समझा देना उचित होगा। एक ही उत्तर-दक्षिण रेखा पर जितने स्थान हैं सब में जैसे क, स, प, ख स्थानों में मध्याह्न या अर्द्ध-रात्रि एक ही समय होती है। परन्तु जो स्थान इस रेखा से पूरब है वहां मध्याह्न या अर्द्धरात्रि पहले और जो स्थान पच्छिम हैं वहाँ पीछे होती है। स पर अ से (मध्य रेखा से) जितना पहले मध्याह्न होता है उतने ही समय को हम स का पूर्व देशान्तर काल (Time difference of longitude) कहते हैं। इसे हम समय की इकाइयों में प्रकट कर सकते हैं; यदि घड़ी पल में लिखें तो इसे देशान्तर घटिका या देशान्तर-नाड़ी कहेंगे और यदि घंटे मिनट में लिखें तो देशान्तर घंटा या मिनट कहेंगे। इस परिभाषा से हमको यह सुविधा होती है कि एक ही बात से हम क, स, प, ख सब का देशान्तर सहज ही प्रकट कर सकते हैं, जब कि योजनों में इनके देशान्तर भिन्न-भिन्न लिखने पड़ेंगे। इसी प्रकार सी पर मध्य रेखा से जितना पीछे मध्याह्न होता है उस समय को सी का पच्छिम देशान्तर काल कहेंगे। आगे पीछे मध्याह्न या मध्यरात्रि इसलिए होती है कि पृथ्वी २४ घंटे में या ६० घड़ी में एक बार अपने अक्ष पर पच्छिम से पूरब की ओर लट्टू की तरह घूम जाती है जिससे सूरज चाँद तारे इत्यादि आकाशीय पिंड पूरब से पच्छिम को चक्कर