सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमध्यमाधिकार ६३ समय होगा जब वह 'रु' पर रहेगा और अर्द्धरात्रि उस समय होगी जब वह 'रै' पर रहेगा । चित्र से यह स्पष्ट है कि जिस समय 'प' पर सूर्योदय होगा उस समय से उतनी देर पीछे 'ल' पर सूर्योदय होगा जितनी देर में सूर्य 'र' से 'रा' तक जाता है । परन्तु र से रा तक जाने में उसको र च रा कोण अथवा प भ ल कोण घूमना पड़ता है क्योंकि परिधि की दो स्पर्श-रेखाओं के बीच का कोण स्पर्श-बिन्दुओं से खींची गयी त्रिज्याओं के बीच के कोण के समान होता है । यह बात मध्याह्न काल या मध्यरात्रि की सूर्य की स्थितियों से और भी सरलतापूर्वक समझ में आयगी; क्योंकि यह बतलाया ही जा चुका है कि सूर्य के 'रि' पर आने से 'प' पर और 'री' पर आने से 'ल' पर मध्याह्न होता है इसलिए जितनी देर में सूर्य रि' से 'री' तक जाती है प की अपेक्षा उतनी ही देर पीछे ल पर मध्याह्न होगा । इसी समय को 'प' 'ल' के बीच का देशान्तर काल कहते हैं । प, ल के देशान्तर को प भ ल कोण से भी प्रकट कर सकते हैं और देशान्तर को अंश, कला विकला में भी लिख सकते हैं चाहे देशान्तर प्रकट करने की इकाई घड़ी पल में हो, चाहे अंश कला में, दोनों तरह से सुविधा होती है और जहाँ जिसकी आवश्यकता पड़ती है वहाँ वही लिखते हैं । यह स्पष्ट ही है कि ६० घड़ी में अथवा २४ घंटे में सूरज एक चक्कर अर्थात् ३६०° चलता है इसलिए एक घड़ी में ६° और १ घंटों में १५° चलेगा; इसलिए यदि दो स्थानों का देशान्तर एक अंश हो तो उन दोनों के मध्याह्न काल या मध्यरात्रि के समयों में १० पल अथवा ४ मिनट का अन्तर होगा । संक्षेप में यों लिखा जाता है कि दोनों का देशान्तर १°, १० पल अथवा ४ मिनट है । साधारणतः मध्य रेखा से देशान्तर नापने की परिपाटी है । जो स्थान मध्य रेखा से पूरब में है उनके देशान्तर के पहले 'पूर्व' और जो पच्छिम में हैं उनके देशान्तर के पहले 'पच्छिम' अवश्य लिख देना चाहिये, नहीं तो भ्रम होने का डर रहता है । चित्र से यह भी सहज ही जाना जा सकता है कि यदि लंका (ल) की अर्द्ध रात्रि के समय का किसी ग्रह का मध्यम स्थान निकाला जाय तो वह 'प' स्थान की अर्द्ध रात्रि के समय का भी मध्यम स्थान नहीं होगा क्योंकि प लंका से पूरब है इसलिए वहाँ अर्द्ध रात्रि पहले ही हो जायगी और ग्रह सदा गतिमान होने के कारण लंका के मध्यम स्थान से कुछ पहले रहेगा । कितना पहले रहेगा, इसकी जानकारी त्रैराशिक द्वारा करनी चाहिये कि जब ६० घड़ी में ग्रह इतना चलता है तो 'प' की देशान्तर घड़ी में कितना चलेगा । जो आवे वह लंका की अर्द्ध रात्रि के मध्यम स्थान से घटा देना चाहिये । यदि स्थान मध्य रेखा से पच्छिम हो तो वहाँ मध्य रात्रि लंका की मध्य रात्रि से उस स्थान की देशान्तर घड़ी के समान पीछे होगी और ग्रह इतनी