सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमध्यमाधिकार ६५ ८ पल पूरब १ है। कुरुक्षेत्र का देशान्तर आजकल क्या माना जाता है यह जानने के लिए यहाँ कोई साधन नहीं है, इसलिए यह नहीं सिद्ध किया जा सकता कि कुरुक्षेत्र ठीक-ठीक मध्य रेखा पर ही है या इससे कुछ पूरब-पश्चिम हटा हुआ है। आगे के तीन श्लोकों में यह बतलाया गया है कि चन्द्रग्रहण से देशान्तर घड़ी कैसे जानी जाती है और उससे देशान्तर से योजन कैसे निकाला जाता है : अतीत्योन्मीलनादिन्दोः पश्चात्तद गणितागतात् । यदा भवेत्तदा प्राच्यां स्वस्थानं मध्यतो भवेत् ॥६३॥ अप्राप्य वा भवेत्पश्चात् एवं वाऽपि निमीलनात् । तयोरन्तरनाडीभिः हन्याद्भूष्णरिधिं स्फुटम् ॥६४॥ षष्ट्या विभज्य लब्धैस्तैर्योजनैः प्राक्तथापरे । स्वदेशपरिधिज्ञेयः कुर्याद्देशान्तरं हि तैः ॥६५॥ अनुवाद -(६३) मध्य रेखा पर (उज्जैन या लंका की उत्तर-दक्षिण रेखा पर) किस समय (मध्य रात्रि से कितनी घड़ी पीछे) पूर्ण ग्रसित चंद्रमा अंधकार से बाहर निकलने लगेगा, यह गणित से जान लेना चाहिये। फिर वेध करके देखना चाहिये कि अपने स्थान में किस समय (अपने यहाँ की मध्य रात्रि से कितनी घड़ी पीछे) पूर्णग्रसित चंद्रमा अंधकार से बाहर निकलने लगता है। यदि गणित-सिद्ध समय से दृक्-सिद्ध समय (यंत्र द्वारा वेध करके जाना हुआ समय) अधिक हो तो समझना चाहिये कि अपना स्थान मध्य रेखा से पूर्व है और (६४) यदि गणित-सिद्ध समय से दृक्-सिद्ध समय कम हो तो समझना चाहिये कि अपना स्थान मध्य रेखा से पच्छिम है। इसी प्रकार उस समय को भी देख कर यह बात जानी जा सकती है जिस समय चंद्रमा का पूर्ण विम्ब अंधकार में चला जाता है। गणित-सिद्ध और दृक्-सिद्ध कालों में जो अन्तर हो वही अपने यहाँ का देशान्तर काल या देशान्तर घड़ी कहलाता है (क्योंकि काल प्रायः घड़ियों में लिखा जाता है)। इस देशान्तर घड़ी को स्फुट परिधि से गुणा करके (६५) गुणनफल को साठ से भाग देने पर जो लब्धि आवे वही अपने स्थान का पूर्व देशान्तर योजन है (यदि स्थान पूर्व में हो) और पच्छिम देशान्तर योजन है (यदि स्थान पच्छिम में हो)। इसी देशान्तर योजना से (६०-६१ श्लोकों में बतलायी हुई रीति के अनुसार ग्रहों का) देशान्तर संस्कार करना चाहिये ॥६३-६५॥ १. शायद इसीलिए भास्कराचार्य ने रोहतक को मध्य रेखा पर नहीं लिखा है- यल्लङ्कोज्जयिनीपु रोपरिकुरुक्षेत्रादि देशान् स्पृशत् । सूत्रं मेरुगतंवुधैर्निगदिता सामध्य रेखाभुवं ॥ गणिताध्याय पृष्ठ ५७ ५