सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १४ ]
जिस प्रकार कि फूल की कली के मध्य में रहनेवाली गन्ध यहाँ पर इस स्थान पर है, अथवा नहीं है, ऐसा निर्णय नहीं होता, 'गन्ध है ऐसा कहना ही ठीक है' उपस्थित पदार्थों का स्पर्धीकरण केवल सूक्ष्मता के कारण नहीं होता। यही गन्ध फूल में—खुड़ी-पराग के खिलने पर समयान्तर में स्पष्ट होती है। इसी प्रकार बच्चों में भी आयु के परिणाम (यौवनावस्था) से शुक्रोत्पत्ति होती है (शुक्रवह क्षोत्स कार्य करने लगते हैं)। एवं रोमराजी (दाढ़ी-मूछ गुच्छ प्रदेघों में बाल) उत्पन्न होती है। स्त्रियों में रोमराजी उत्पन्न होने के साथ २ रज के धीरे २ एकत्रित होने से स्तन, गर्भाशय, योनि में वृद्धि होती है।
वि० मन्तव्य—बालकों में भी शुक्रधातु होता है केवल व्यक्त नहीं होता। इसी प्रकार बालिकाओं में रजस रहता है केवल व्यक्त नहीं होता। विद्यमान पदार्थ समय आने पर—अभिव्यक्त हो जाते हैं। बूढ़ों में भी रहते हैं परन्तु व्यक्त नहीं रहते ॥ १८ ॥
स एवात्ररसो वृद्धानां (जरा) परिपक्वशरीरत्वाद्-प्रीणनो भवति ॥ १९ ॥
यही आहार-रस वृद्ध पुरुषों में बुढ़ापे के कारण शरीर के परिपक्व होने से शरीर का थोड़ा तर्पण करता है। (बुढ़ावस्था में—केशिकाओं में कठोरता आती है। घमनीदाब्य होना परिपक्व शरीर का लक्षण है) ॥ १९ ॥
त एते शरीरधारणाद्वातव इत्युच्यन्ते ॥ २० ॥
ये रस रक्त आदि शरीर का धारण करने से धातु कहे जाते हैं।
वि० मन्तव्य—डुधाज धारणपोषणयोः—धातु से "धातु" शब्द की निष्पत्ति होती है—शरीर का धारण और पोषण करने के कारण रस एवं रक्त आदि द्रव्य—"धातु" कहे जाते हैं ॥
तेषां क्षयवृद्धौ शोणितनिमित्ते, तस्मात्तदधिकृत्य वक्ष्यामः। तत्र, फेनिलमरुणं कृष्णं पुरुषं तनुं शीघ्रगमस्कन्दि च वातेन दुष्टं, नीलं पीतं हरितं श्यावं विस्मन्निष्टं पिपीलिकामक्षिकाणामस्कन्दि च पिचनेन दुष्टं, गैरि-कोदकप्रतीकाशं स्निग्धं शीतलं बहलं पिच्छलं चिरस्त्रावि मांसपेशीप्रभं च इल्लेपदुष्टं, सर्वलक्षणसंयुक्तं काञ्चिकामं विशेषतो दुर्गन्धिं च सन्निपातदुष्टं द्विदोषलिङ्गं संसृष्टम्, जीवरक्तमन्यत्र वक्ष्यामः ॥ २१ ॥
इन धातुओं की क्षोणता अथवा वृद्धि में मूल कारण रक्त ही है। इसलिये रक्त के ही विषय में कहते हैं। इनमें-फेनिल झागदार, अरुण (लाल), कृष्ण (काला), पुरुष (अपिच्छल रूख), तनु (पतला), शीघ्रगामि (जल्दी बहनेवाला), और अस्कन्दि (न जमनेवाला), रक्त वायु से दूषित होता है।
नील (नीला), पीत (पीला), हरित (हरा), श्याव (काला), विस्म (आमगन्धि), चिरुट्टी एवं मक्खियों के लिये अनिष्ट-कारक (पसन्द नहीं करती) और न जानेवाला रक्त, निस्त्र से दूषित समझना चाहिये। गेरु के पानी के समान (पाण्डुलोहित) स्निग्ध, शीतल, बहल (घन), पिच्छल, चिरस्त्रावि (देर में बहनेवाला), मांसपेशी के समान रक्त कफ से दूषित होता है। तीनों दोषों के लक्षणों से युक्त, काञ्चिक के समान, खासकर दुर्गन्धयुक्त रक्त सन्निपात से दूषित होता है। (दो दोषों से दूषित रक्त में दोनों दोषों के लक्षण होते हैं)। जीवरक्त (शुद्ध-शरीरपोषक रक्त) की व्याख्या दूसरी जगह से करेंगे। (रक्त से दूषित, रक्तपित्त से दूषित रक्त के समान परन्तु अधिक काला होता है।
वि० मन्तव्य—रक्त के क्षय—न्यूनता से धातुओं का क्षय और उसकी वृद्धि से उनकी वृद्धि होती है। अरुण—कालिमा लिये लाल ॥ २१ ॥
इन्द्रगोपकप्रतीकाशमसंहृतमविवर्णं च प्रकृतिस्थं जानीयात् ॥ २२ ॥
जो रक्त इन्द्रगोप (वीरबहूटी) के समान रङ्गवाला, असंहृत (न तो बहुत स्वच्छ और न बहुत घना) और अविवर्ण (तपनीय स्वर्ण वर्ण१ पञ्चालक्तक, गुञ्जाफल वर्णवाला, अथवा वस्त्र आदि पर लगने पर धोने से भी जब विकृत न हो), उस रक्त को स्वामाविक शुद्ध समझना चाहिये ॥ २२ ॥
विस्त्राण्यप्यन्यत्र वक्ष्यामः ॥ २३ ॥
विस्त्राण्य रक्तों की—किनका रक्त विस्त्रवण करने योग्य है—व्याख्या अष्टविधकर्मधाय सू० २५ में करेंगे ॥ २३ ॥
अथाविस्त्राण्य—सर्वाङ्गशोकः, क्षीणस्थ चाम्लभोजन-निमित्तः, पाण्डुरोग्यशंसोदरिशोषिगभिणीनां च श्रुयश्रवः ॥
निम्न रोगों विस्त्रावण के अयोग्य हैं—सर्वाङ्गशोफी, क्षीण पुरुष के, या अम्ल भोजन के कारण उत्पन्न शोथ, पाण्डुरोगी अर्था उदररोगी, शोषि—गभिणी, इनके शोथ में (एक अङ्ग में उत्पन्न वृण-शोथ में भी) रक्तका मोक्षण नहीं करना चाहिये ॥
शस्त्रविस्त्रावणं द्विविधं प्रच्छानं शिराण्यधनं च ॥ २४ ॥ शस्त्र द्वारा रक्तमोक्षण दो प्रकार का है, यथा—प्रच्छान और शिराण्यधन ॥ २४ ॥
१ तपनीयेन्द्रगोपाभं पञ्चालक्तकसन्निभम्। गुञ्जाफलसवर्णञ्च विशुद्धं विद्धि शोणितम् ॥ चरक ॥ 'असंहृतम्' का अर्थ न बहुत पतला और न बहुत घना भी है। अविवर्ण-विविधवर्ण का—(धाणेकर जी)।