सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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वि० मन्तव्य—रस से धातुओं की उत्पत्ति का यह भी एक प्रकार है वैसे तो रस एवं रक्त से भी धातुओं का पूर्ण-पूति ( सू० ११ देखिये ) तथा बुद्धि ( सू० २१ ) होती है ॥ १० ॥
तत्रैतेषां धातूनामन्नपानरसः प्रीणयिता ॥ ११ ॥
इन धातुओं के मध्य में—पूर्वोक्त रक्त आदि धातुओं की बुद्धि करनेवाला, अन्न-पान का सार भाग यही रस है ॥ ११ ॥
रसजं पुरुषं विद्याद्वसं रचेत् प्रयत्नतः ।
अन्नात् पानाच्छ मतिमानाचाराच्छाप्यतन्द्रितः ॥ १२ ॥
पुरुष की उत्पत्ति भी रस से ही है, इसलिये प्रयत्नपूर्वक रस की रक्षा करनी चाहिये । आलस्य रहित होकर—बुद्धिमान् मनुष्य अन्न एवं पान से रस की रक्षा करता है ॥ १२ ॥
तत्र 'रस' गतो धातुः, अहरहर्गच्छतीत्यतो रसः ॥ १३ ॥
रस शब्द की निस्कृति—रस-गतो-इस धातु से रस शब्द बनता है । जिसका अर्थ है कि प्रतिदिन चलता रहता है, इस लिये इसको रस कहते हैं ॥ १३ ॥
स खलु त्रीणि त्रीण कलासहस्राणि पञ्चदश च कला एकैकस्मिन् धाताववतिष्ठते, एवं मासेन रसः शुक्लं स्त्रीणां चार्त्तवं भवति ॥ १४ ॥
भवति चात्र—
अष्टादशसहस्राणि सङ्ख्या ह्यस्मिन् समुच्चये ।
कलानां नवतिः प्रोक्ता स्वतन्त्रपरतन्त्रयोः ॥ १५ ॥
प्रसादजन्य धातुओं को कहकर प्रसङ्ग से उपधातुओं को भी कहते हैं । यथा—
“रसात् स्तन्यं तथा रक्तमसृजः कण्डरा शिराः ।
मांसाद् वसा त्वचः पट् च मेदसः स्नायुसन्धयः” ॥
रस से स्तन्य एवं रक्त ( आर्त्तव ) दोनों उत्पन्न होते हैं ।
क्योंकि गर्भाधान के पश्चात् ऋतु बन्द हो जाती है—और स्तनों में बुद्धि होने लगती है । दूध आने लगता है । जब तक माता के स्तनों में दूध का जोर रहता है ऋतु भी ठीक नहीं आती ।
यह ऋतु भी शुक्र के समान एक मास में रक्त से ही बनता है । इसलिये कोई २ आचार्य आर्त्तव को भी शुक्र कहते हैं । यथा—
“वृत्तकुम्भो यथैवान्निमाश्रितः प्रबिलीयते ।
विसर्पत्यार्त्तवं पुंसां तथा स्त्रीणां समागमे ॥
सूक्ष्माः केशप्रतीकावा बीजरक्तवहाः शिराः ।
शर्भाशयं पुरयन्ति मांसाद् बीजाय कल्पते ॥”
इन उपधातुओं में गति—नहीं—अर्थात् अन्य धातु का पोषण नहीं होता—इसलिये इनको उपधातु कहते हैं ।
१ जैसा कि चरक में कहा है—पुष्यन्ति त्वाहाररसाद्, रस, रधिर, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र एवं ओज इत्यादि ।
यह रस प्रत्येक धातु में ३३१५ कला पर्यन्त रहता है । इस प्रकार एक मास में रस धातु पुरुषों में शुक्र और स्त्रियों में आर्त्तव होता है । इस रस से वीर्य बनने के समुच्चय में इस तन्त्र तथा अन्य तन्त्रों के अनुसार भी १८०६० कला समय लगता है । वह रस शब्द, तेज तथा जल के विस्तार की भाँति समस्त शरीर में अत्यन्त सूक्ष्म रूप से प्रवेश करता है ।
वक्तव्य—चरक में रस धातु की उपमा चक्र से दी है, यथा—“संतत्या भोज्यधातूनां परिबृत्तिस्तु चक्रवत् ।” आतुरेद में ध्वनि, उष्णिमा और जल के साथ दी हुई उपमा भी आज-कल फिल्टरेशन, ओसोमोसि, डायलेसिस, डिफ्युजन के साथ बटती है । तीक्ष्णगन्धियों में शीघ्र २४ घण्टे में शुक्र बनता है, और मन्दगन्धिकालों में एक मास या इससे अधिक समय लगता है और मध्यगन्धिकालों में छे दिन लगते हैं ॥ १४,१५ ॥
स अन्दाजिर्जलसन्तानवदणुना विशेषेणानुधावत्येवं शरीरं केवलम् ॥ १६ ॥
यह रस शब्द-संतान की तरह तिरछा, अर्चि ( आग )—संतान की तरह ऊपर की ओर जल संतान की तरह नीचे की ओर गति करके सम्पूर्ण शरीर का पोषण करता है ॥ १६ ॥
वाजीकरणयस्तवाधयः स्वबलगुणोत्कर्षाद्विरेचनवदुप्युक्ताः शीघ्रं विरेचयन्ति ॥ १७ ॥
वाजीकरण औषधियाँ अपने बल ( प्रभाव ) की उत्कर्षता से ( संकल्प, पादलेप, कान्तास्पृश आदि ) अपने गुण की उत्कर्षता से ( दूध घी आदि ) कुछ अपने बल एवं गुण दोनों की उत्कर्षता से ( माष आदि ) सेवन करने पर विरेचन की भाँति शुक्र का विरेचन करती हैं ॥ १७ ॥
यथाहि पुष्पमुकुलस्थो गन्धो न शक्यमिहास्तीतिवक्तुं, नैव नास्ताति, अथ चास्ति, सतां भावानामभिप्यक्तिरिति ज्ञात्वा, केवलं सौहृन्त्यान्नाभिप्ययत्ये, स एव विवृतपत्र-केशरे पुष्पे कालान्तरेणाभिप्यक्ति गच्छति, एवं बालानामपि वयःपरिणामाच्छुक्रप्रादुर्भावो भवति, रोमराज्यादयश्च विशेषेण नारीणाम् । रजसि चोपचोयमाने शनैः शनैः स्तननगर्भाशययोन्मिबुद्धिर्भवति ॥ १८ ॥
१ तन्त्रान्तर में कहा है कि—
आहारादोषततो यः स श्वेको रसत्वं नियच्छति ।
शोणितत्वं तूतोयेऽस्ति, चतुर्थं मांसतामपि ॥
मेदस्त्वं पंचमे षष्ठे त्वस्थित्वं सप्तमे त्रियात् ।
मज्जत्वं शुक्रतां यायासियमात्वष्टमे, गुणाम् ॥
पङ्क्तिः केचिदहोरात्रैः केचित् सप्तभिरेव च ।
इच्छन्ति मुनयः प्रायो रसस्य परिवर्तनम् ॥ १९ ॥