भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[अ० १४]

होती है, तथापि—रक्त में रस मिला रहता है, अतः एक दृष्टि से वह रस ही कहा जाता है। भले ही वह रक्त कहा जा सकता है और अन्यत्र हृदय (उरस) को रक्त का आशय माना भी है। तस्मिन् सर्वं.....जिज्ञासा रस शरीर के समस्त अवयवों (सेल जीवकोष) आदि में जब अनुकूल—उचित सरण-गति करता है तब वह स्नेहन आदि सदृशों के कारण सौम्य (सोम-चन्द्र के) गुणों से युक्त माना जाता है। अन्यथा आग्नेय उक्त-गुणों का नाशक माना जाता है या रोगोत्पादक होता है। चन्द्र को वेद में—“अमृतस्य नामिः” केन्द्र माना गया है ॥ ३ ॥

स खलवाण्यो रसो यकृतप्लीहानौ प्राप्य रागमुपैति ॥ ४ ॥

यह जलीय (श्वेत) रस यकृत-प्लीहा में पहुँचकर लाल हो जाता है। (आजकल भी पाण्डु रोग में—या रक्त की कमी में यकृत का उपयोग किया जाता है।) सुश्रुत ने भी अति रक्तक्षाय में यकृत ही खाने को कहा है। “यकृद्वा वा भक्षयेद-जमामं पित्तसमायुतम्”।

वि० मन्तव्य—रस को “आप्य” इसलिये कहते हैं कि वह व्यातिशील है। रस धातु प्रथम रक्त में मिल लेता है और फिर रक्त के साथ २ यकृत एवं प्लीहा में जाता है और वहाँ रक्त पित्त की रासायनिक क्रिया से लाल हो जाता है। रक्त में जो श्वेतकरण होते हैं वे रस के ही होते हैं और वे ही वहाँ जाकर लाल हो जाते हैं ॥ ४ ॥

श्लोकौ चात्र भवतः—

रक्षितास्तेजसा त्वापः शरीरस्थेन देहिनाम् ।

अव्यापन्नाः प्रसन्नोत्त रक्तमित्यभिधीयते ॥ ५ ॥

कहा भी है—

प्राणियों के शरीरस्थ शुद्ध तेज से (रक्त पित्त से) रंगे लाल किये हुए अदृषित जल (रस) को रक्त कहते हैं।

वि० मन्तव्य—वही श्वेत एवं सौम्य रस यकृत-प्लीहा गत रक्त पित्त से रक्षित होकर “रक्त” कहलाता है ॥ ५ ॥

रसादेव क्षिया रक्तं रजःसंज्ञं प्रवर्तते ।

तद्वर्षाद्वा दादशादूर्ध्वं याति पञ्चाशतः क्षयम् ॥ ६ ॥

रक्त एवं आर्तव में मेद—

क्षियों में रक्त ही-श्रुतुखाव में योनिमार्ग से रज-रूप में प्रवृत्त होता है। यह रज बारह वर्ष की आयु से लेकर पचास वर्ष की आयु तक रहता है, पीछे नष्ट हो जाता है। (रजः की प्रवृत्ति एवं निवृत्ति का यह नियम सम शीतोष्ण देश की अपेक्षा से है। यूरोप आदि शीत देशों में श्रुतुकाल देर में आता है, और गरम देशों में शीघ्र आ जाता है) ॥ ६ ॥

आर्तवं शोणितं स्वानेन्यम्, अग्नीपोमीयत्वाद् गर्भस्य ॥

आर्तव संवक रक्त (आग्नेय) अग्नि गुणविशिष्ट है। क्योंकि गर्भ अग्नीपोमीय है। आगे शरीरस्थान में कहेंगे कि

क्षियों अग्नि गुण भूमिष्ट हैं, पुरुष सौम्य हैं। इसलिये आर्तव भी आग्नेय है ॥ ७ ॥

पाञ्चभौतिकं त्वपरे जीवरक्तमाहुराचार्याः ॥ ८ ॥

दूसरे आचार्यों का मत है कि—जीवरक्त जीव के समान चेतना का कारण रक्त पाँचभौतिक (पृथिवी आदि पंचभूतों से मिला है ॥ ८ ॥

विक्षता द्रवता रागः स्पन्दनं लघुता तथा ।

भूम्यादीनां गुणा ह्येते दृश्यन्ते चात्र शोणिते ॥ ९ ॥

विक्षता (आमगन्धि-पृथिवी का गुण), द्रवता (द्रव-भावः—जल का गुण), राग (लालिमा-अग्नि का गुण), स्पन्दन (थोड़ा हिलना-वायु का गुण), लघुता (हल्कापन-आकाश का गुण) ये भूमि आदि पञ्चमहाभूतों के गुण रक्त में दिखायी देते हैं। इसलिये रक्त पाँचभौतिक है ॥ ९ ॥

रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदः प्रजायते ।

मेदसोऽस्थि ततो मज्जा मज्जः शुक्लं तु जायते ॥ १० ॥

पाकजन्य प्रसाद भाग से क्रमशः रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा, मज्जा से शुक्ल उत्पन्न होता है।

जिस प्रकार कि गन्ने के रस को पकाने पर ऊपर मलाई उतरती है, नीचे किट्ट भाग रहता है, उसी प्रकार अन्न के पकने से मल (विट्ट मूत्र) एवं सार भाग (रस) उत्पन्न होता है। इस रस के पुनः पकने से मल (कफ), स्थूल भाग (रस) और सूक्ष्म भाग (रक्त) उत्पन्न होता है। रक्त के पकने से मल (पित्त), स्थूल भाग (मांस) बनता है। मांस के पकने से मल (श्रोत्र, नासिका आदि का मल), स्थूल भाग (मांस) सूक्ष्म भाग (मेद) बनता है। मेद के पकने से मल (स्वेद) स्थूल भाग (मेद) और सूक्ष्म भाग (अस्थि) बनती है। अस्थि के अपनी अग्नि द्वारा परिपाक होने पर मल (केश, लोम, शमश्रु), स्थूल भाग (अस्थि), सूक्ष्म भाग (मज्जा) बनती है। मज्जा के परिपाक से मल (आंख-त्वचा का स्नेह), स्थूल भाग (मज्जा) और सूक्ष्म भाग (शुक्ल) बनता है। शुक्ल के स्वाग्नि द्वारा परिपाक होने पर दो ही भाग बनते हैं। अब इसमें से मल भाग नहीं निकलता। स्थूल भाग (शुक्ल) और सूक्ष्म भाग (ओज) होता है।

१ (१) धातवो हि धात्वाहाराः प्रकृतिभुवनवर्त्तन्ते ।

कहा भी है—

चरक सू० अ० २८।

“स्थूलसूक्ष्ममलैः सर्वे भिद्यन्ते धातवस्त्रिधा ।

स्वस्थूलोऽंशः परं सूक्ष्मस्तन्मलं याति तन्मलः ॥

स्वानग्निभिः पच्यमानेषु मलः षट्सु रसाद्विषु ।

त शुक्ले पच्यमानेऽपि हेमनीवाक्षये मलः ॥