भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० १४ ]

सूत्रस्थानम्

४६

शीताभिरग्निः परिषेचयेद् बध्नीत वा, कषायमधुरस्ति- न्वशीतैश्च प्रदेहैः प्रदिद्यादिति ॥ २३ ॥

शोणितवसेचन होने पर रक्त के योग ( सम्यक् खाव ) एवं अयोग ( हीन, मिथ्या, अतियोग ) को देखकर जलौका के ब्रणों की चिकित्सा करनी चाहिये । योगखाव में शतवौत घृत लगाना चाहिये । हीन अयोग में रक्तखाव के लिये मधु से घर्षण करना चाहिये । अति रक्तखाव में-शीतल जल का परिषेचन या शीतल जल की पट्टी बांधनी चाहिये । मिथ्या रक्तखाव में-कषाय प्रदेह ( शेष दुष्ट रक्त के प्रसादन के लिये ), मधुर प्रमेह ( सुत अशुद्ध रक्त को रोकने के लिये ), मूलां आदि उपद्रवों की शान्ति के लिये शीतल प्रदेह-सेक लगाना चाहिये ॥ २३ ॥१

भवति चात्र—

क्षेत्राणि ग्रहणं जातीः पोषणं सावचारणम् । जलौकसां च यो वेत्ति तरसाध्यानं स जयेद् गदान् ॥२४॥ कहा भी है—

जो वैद्य जलौकाओं के क्षेत्र, पकड़ने की विधि, जाति, पोषणविधि, अवचारणविधि जानता है, वह जलौकाओं द्वारा साथ रोगों को शान्त कर लेता है ॥ २४ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने जलौकावचारणीयो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ।

—○—

चतुर्दशोऽध्यायः

अथातः शोणितवर्णनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

पिछले अध्याय में रक्तखाव का वर्णन किया, इसलिये रक्त का वर्णन करने के लिये 'शोणित-वर्णनीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं । जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १, २ ॥

तत्र पाञ्चभौतिकस्य चतुर्विधस्य षड्दसस्य द्विविध- वीर्यस्याष्टविधवीर्यस्य वाऽनेकगुणस्योपयुक्तस्याहारस्य सम्यक्परिणतस्य यस्तेजोभूतः सारः परमसूक्ष्मः स 'रस' इत्युच्यते, तस्य हृदयं स्थानं, स हृदयाच्छतुर्विधगतिध- मनीरनुप्रविर्योधर्वागा दश दशाधोगामिन्यश्चतस्रश्च

१ जोक के काटने पर कई बार बहुत रक्तखाव होता है । इसका कारण यह है कि जोक के सिर में कई छोटी छोटी ग्रन्थियाँ होती हैं, जिनका रस ब्रणों में पहुँचता है । इस रस में ( Hiudin ) हीरुडीन नामक द्रव्य होता है । इस द्रव्य के रक्त के साथ मिलने से रक्त जल्दी नहीं जमता । जोक के दंश के समय रक्त चूसने पर यह पदार्थ ब्रण में पहुँच जाता है । इसलिये रक्त जमता नहीं, बहता रहता है ।

तिर्यग्गाः कृत्स्नं शरीरमहरहस्तपयति वर्धयति धारयति यापयति चाहृष्टहेतुकेन कर्मणा । तस्य अरीरमनुसरतो- ऽनुमानाद् गतिरुपलक्षयितव्या क्षयवृद्धिवैकृतेः । तस्मिन् सर्वशरीरावयवदोषधातुमलाशयानुसारिणि रसे जिज्ञासा- किमयं सौम्यस्तेजसः ? इति । अत्रोच्यते—स खलु द्रवानुसारी स्नेहनजीवनतर्पणधारणादिभिर्विशेषः सौम्य इत्यवगम्यते ॥ ३ ॥

पृथिवी आदि पञ्चमहाभूतों का पेय, भोज्य, भक्ष्य, लेह्य- भेद से चार प्रकार का, मधुर, अम्ल आदि लै भेद से रस का; शीत उष्ण भेद से दो प्रकार के वीर्य का अथवा आठ प्रकार ( शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, विशद, पिच्छल, मृदु, तीक्ष्ण- भेद से ) के वीर्य का, अथवा अनेक ( वीस ) गुणोंवाले आहार का भोजन करने पर-इसके सम्यक्परिपाक होने से जो तेजोभूत ( अग्नि द्वारा उत्पन्न ) परम सूक्ष्म सार निर्मल- श्रेष्ठ अंश है-वह रस कहा जाता है । इस रस का स्थान हृदय है१ । यह रस चौबीस धमनियों द्वारा सम्पूर्ण शरीर में फैलकर रात दिन शरीर का तर्पण करता है ( गर्भावस्था में ), वृद्धाता है ( बाल्यावस्था में ), धारण करता है ( युवावस्था में ), यापन करता है ( वृद्धावस्था में ) यह कर्म अचेतन होने के कारण अहृष्ट ( धर्माधर्म ) के कारण होता है । इन चौबीस धमनियों में से दस धमनियाँ ऊपर जाती हैं, और चार धम- नियाँ तिरछी जाती हैं । इस रस के शरीर के अन्दर फैलते हुए-इसकी गति को क्षय-वृद्धि विकारों द्वारा अनुमान से जानना चाहिये । इन सम्पूर्ण शरीरावयवों में दोष, धातु- मल-आशय में फैलनेवाले इस रस के विषय में यह जिज्ञासा है कि-क्या यह रस सौम्य है अथवा तेजस ( आग्नेय गुणी ) है । उत्तर-यह कहा जाता है कि—यह रस द्रव के समान- अनुसरण शील, स्नेहन, जीवन देनेवाला, तर्पण, धारण, अवधमन आदि भेदों से 'सौम्य' ( कफरूप ) रूप ही जाना जाता है ।

वि० मन्तव्य—तस्य हृदयं स्थानम्—इस रस ( सर्वदा गतिशील ) का हृदय स्थान अर्थात् कुछ समय के लिये रुकने ( गतिहीन होने ) का आश्रय है । छा-गति निवृत्तौ धातु से स्थान शब्द निष्पन्न होता है और गतिनिवृत्ति का अर्थ है गति की निवृत्ति-रुकना । वह रस—हृदय से धमनियों में जाता है अर्थात् हृदय की गति के प्रभाव से उन नालियों में धमन की उत्पत्ति होती है । यद्यपि हृदय से रक्त की प्रवृत्ति

१ तेज अग्नि द्वारा उत्पन्न शुक्र या घी के समान उत्पन्न, झी के समान श्वेत ( Chyls, रूपेण ), सारबिद्ध आदि के मल रहित-सूक्ष्म स्रोतों में प्रायः होने वाला है—पोष्य धातु रस का ही हृदय स्थान है । पोषक आहार रस का स्थान धमनियाँ हैं ।