सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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‘मुभ्रतसंहिता’
[ अ० १३ ]
कन्दोश्चूर्णोक्त्य, शय्यार्थं तृणसौदकानि च पत्राणि, उ्यहात्क्यहाचाभ्योऽन्यज्जलं भदयं च दद्यात्, समरात्रात्र समरात्रात्र घटमन्यं संक्रामयेत् ॥१७॥
निर्विष जलौका को पकड़कर नये बड़े घड़े में तालाब या तड़ाग के पानी में कीचड़ को डालकर इसमें जौक को रखना चाहिये। इनके खाने के लिए सरवाल जलचर प्राणियों का शुष्क मांस या कन्द का चूर्ण देना चाहिये। सोने के लिए-विस्तर में तिनके या पानी में होनेवाले कमल आदि के पत्र बरतने चाहिये। तीसरे-तीसरे दिन इनका पानी बदल देना चाहिए। और भोजन भी नया देना चाहिए। सातवें दिन इनको एक घड़े से दूसरे घड़े में बदल देना चाहिए ॥१७॥
भवति चात्र—
स्थूलमध्याः परिकिळ्घटाः पृथ्व्यो मन्दविचेष्टिताः।
अग्राहिण्योऽल्पपापिन्यः सविषाश्च न पूजिताः ॥१८॥
बीज से मोटी, देखने में बुरी, विस्तीर्ण, मन्दगामि, स्थान का ग्रहण न करनेवाली ( न लगनेवाली ), थोड़ा रक्त पीनेवाली, और विषैली जौक प्रशस्त नहीं है ॥१८॥
अथ जलौकोवसेकसाध्यव्याधितमुपवेश्य संवेश्य वा, विरुद्धं चास्य तमवकाशं मृदुगोमय चूर्णैर्घारुजः स्यात्। गृहीताश्च ताः सर्पपरजनीकल्कोदकप्रदिग्धगात्रीः सलिलसरकमध्ये मुहूर्तस्थिता विगतकल्मा झात्वा ताभी रोगं प्राहयेत्। रुद्धगुणकुलार्द्रपिचुप्रोतावच्छन्नां कृत्वा मुखमपावृणुयात्, अगृह्णन्त्ये क्षीरबिन्दुं शोणितविन्दुं वा दद्यात्, शस्त्रपदानि वा कुर्वीत, यद्येवमपि न गृह्णीयात्तदाऽन्यां प्राहयेत् ॥१९॥
जलौका द्वारा साध्य रोग से ग्रस्त रोगी को बिठाकर अथवा लिटाकर पीड़ा रहित स्थान को मिट्टी या गोबर द्वारा घिसकर छूट कर लेना चाहिए। यदि स्थान पीड़ायुक्त हो तो पिचु से साफ करके रूख कर लेना चाहिए। जौक को पकड़कर सरसो-हल्दी के कल्कोदक से जौक के शरीर को मलकर पानी के बर्तन में थोड़ी देर रखकर-थकान दूर होने पर रोगवाले स्थान पर लगा देना चाहिए। चिकने पतले-श्वेत-गीले पिचु या प्लोत से ढाँप देना चाहिए, परन्तु मुख को नहीं ढाँपना चाहिए। यदि स्थान का ग्रहण न करे तो दूध की बूँद रख देनी चाहिए-अथवा शस्त्र से पोंछना चाहिए, जिससे रक्त की गन्ध आ जाए। इस प्रकार भी रक्त ग्रहण न करे तो दूसरी जलौका को लगा देना चाहिए ॥१९॥
यदा च निविशतेऽश्वसुरवदाननं कृतवोन्नम्य च स्कन्धं तदा जानीयाद् गृह्णातीति, गृह्णन्ती चाद्रिवक्षावच्छन्नां कृत्वा धारयेत् ॥२०॥
और जब जौक लग जाती है तब घड़े के खुर के समान मुख को करके, स्कन्धों को ऊँचा करके लगती है, तब समझना चाहिए कि रक्त ले रही है। रक्त को पीती हुई जौक को गीले वस्त्र से ढाँप देना चाहिए और थोड़ा-पानी डालना चाहिए। जौक-पहिले दूध रक्त को पीता है-जिस प्रकार हंस-दूध से मिले पानी में प्रथम दूध को पीता है ॥२०॥
दंशे तोदकण्डुप्रादुर्भावैर्जानीयाच्छुद्धमियमादत्तइति, शुद्धमाददानामपनयेत्, अथ शोणितगन्धेन न मुखेन्मुखमस्याः सैन्धवचूर्णनावकिरेत् ॥२१॥
विशुद्ध रक्त के पीने पर दंश में तोद ( धातुक्षय के कारण उत्पन्न वायु की पीड़ा ), खाज उत्पन्न होती है। जिस समय शुद्ध रक्त पान करने लगे, तब इसको हटा लेना चाहिए। यदि रक्त की गन्ध के कारण स्थान को न छोड़े तब इसके मुख पर सैन्धव लवण का चूर्ण डाल देना चाहिए। जौक में गन्धेन्द्रिय नहीं होती, इसलिए शोणितलैल्यात् पाठ ठीक है ॥
अथ पतितानां तण्डुलकण्डनप्रदिग्धगात्री तैललवणभ्यक्तमुखी वामहस्ताङ्गुष्ठाङ्गुलिभ्यां गृहीतपुच्छां दक्षिणहस्ताङ्गुष्ठाङ्गुलिभ्यां शनैः शनैरनुलोममनुमाज्यैदासुखात्, तावचावत् सम्यग्वातलिङ्गानीति। सम्यग्वान्ता सलिलसरकेन्यस्ता भोक्तुकाभा सती चरेत्। या सौदती न चेष्टते सा दुर्वान्ता तां पुनः सम्यग्वामयेत्। दुर्वान्ताया व्याधिरसाध्य इन्द्रमदो नाम भवति। अथ सुवान्तां पूर्ववत् सन्निद्ध्यात् ॥२२॥
जिस समय जौक गिर पड़े तब धान्य के चावलों की कणकियों से इसके शरीर को मलकर, लवण और तैल से मुख को लिप्त करके, बायें हाथ के अंगुली एवं अंगुष्ठ से पूछ पकड़कर दक्षिण हाथ की अंगुली एवं अंगुष्ठ द्वारा धीरे धीरे लोमों के अनुकूल परिमार्जन करना चाहिए। जब तक भली प्रकार वमन के लक्षण दीखने न लगे तब तक वमन करना चाहिए। भली प्रकार से वमन होने पर पानी के पात्र में रखने पर खाने की इच्छा से विचरण करने लगती है। जो पानी में डूब जाती है, हिलती नहीं, उसने भली प्रकार से वमन नहीं किया ऐसा समझना चाहिए। उसको फिर वमन कराना चाहिए। भली प्रकार से वमन न होने पर जौक को इन्द्रमद ( रक्तमद ) नाम का रोग हो जाता है—यह रोग असाध्य है। जिसने भली प्रकार से वमन किया हो, उस जौक को पूर्व की भाँति रखना चाहिए ॥२२॥
शोणितस्य योगायोगानवेद्य शतधौताभ्यश्च तत्पिचुधारणं वा, जलौकोन्नानं मधुनाऽवघट्टयेत्,
१ संग्रह में यही पाठ है—लैल्याच्च दशममुच्चत्यः क्षीरलवणचूर्णं वा मुखं दद्यात्।