भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० १२ ]

सर्वस्थानम्

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दंशे श्वयशुरतिमान् कण्डुमूर्च्छा ज्वरो दाहश्चर्दिभदः सदनमिति लिङ्गानि भवन्ति । तत्र महागदः पानलेपन नस्यकर्मादिपूयोऽयः । इन्द्रायुधा दष्टमसाध्यम् । इत्येताः सविषाः सचिकित्सा व्याख्याताः ॥११॥

इनमें विष युक्त-जौँके—कृष्णा, कर्बुरा, अलगर्दा, इन्द्रायुधा, सामुद्रिका और गोचन्दना । इनमें—कृष्णा जौँक का रङ्ग अञ्जन (कजल) के समान और शिर बड़ा होता है । कर्बुरा जौँक-वस्तिमत्स्य (रोहित मछली) के समान सर्पकार तथा कुक्षि पर उभरी रेखावाली होती है । अलगर्दा-जौँक-रोम-बलियुक्त, महागर्श तथा काले मुखवाली है । इन्द्रायुधा-ऊपर से इन्द्रधनुष के समान चित्र-विविचित्र रेखाओं से शोभित होती है । सामुद्रिका—कुछ काली-पीली, नाना प्रकार के श्वेत विन्दुओं से चित्रित होती है । गोचन्दना जौँक बैल के अण्डकोश की भांति निचले भाग में दो भागों में विभक्त हुई, सूक्ष्म मुखवाली होती है । इन जलौकाओं के द्वारा पुरुष को काटने पर-बहुत अधिक सूजन, खाँज, मूर्च्छा, ज्वर, दाह, वमन, मन्द-नशा, अज्ञों में ग्लानि होती है । इनकी चिकित्सा के लिए सर्पदष्ट कल्प में कहा महागद पीने के लिये, लेप के लिये, नस्य, परिषेक आदि कार्यों में बरतना चाहिये । इन्द्रायुध-जौँक से काटा हुआ मनुष्य असाध्य है । इस प्रकार से विषैली जौँक का चिकित्सा के साथ वर्णन कर दिया । (महागद-कल्प स्थान में-‘त्रिवृद्ध विशाल्ये’ इस श्लोक में कहा है ॥११॥

अथ निर्विषाः—कपिला, पिङ्गला शङ्कुमुखी, मूषिका, पुण्डरीकमुखी, सावरिका चेति । तत्र, मनःशिलारजिताभ्यामिव पार्वार्ध्यां पृष्ठे स्निग्धा सुद्गवर्णा कपिला, किंचिद्रक्ता वृत्तकाया पिङ्गलस्युगा च पिङ्गला, यकृद्गर्ग शीघ्रपायिनी दीर्घतीक्ष्णमुखी शङ्कुमुखी, मूषिकाकृतिवर्णा-ऽनिष्ठगन्धा च मूषिका, सुद्गवर्णा पुण्डरीकतुल्यवक्त्रा पुण्डरीकमुखी, स्निग्धा पद्मपत्रवर्णाऽष्टादशङ्कुगुलप्रमाण सावरिका सा च पश्वर्थे, इत्येता अविषा व्याख्याताः ॥१२॥

निर्विषा जलौका—कपिला, पिङ्गला, शङ्कुमुखी, मूषिका, पुण्डरीकमुखी, सावरिका । इनमें कपिला जौँक—के दोनों पार्श्व मैनासिल से रंगे हुए प्रतीत होते हैं, पीठ-मूँग के समान चिकनी होती है । पिगला जौँक कुछ लाल गोल शरीर, पिगलवर्ण और शीघ्रगामि होती है । शङ्कुमुखी जौँक-यकृत के समान रङ्ग की (काली-नीली) शीघ्र-रक्त पीनेवाली, लम्बे एवं तीक्ष्ण मुख की होती है । मूषिका—चूहे के रंग तथा चूहे के आकार की बुरी गन्धवाली होती है । पुण्डरीकमुखी-मूङ्ग के समान रङ्ग-वाली तथा कमल के सहस्र मुख की होती है । सावरिका-स्निग्ध, कमल पत्र के रङ्गवाली, अष्टास्ह अंगुल लम्बी होती है । यह सावरिका जौँक हाथी आदि पशुओं के लिये ही है । इस प्रकार

से विषरहित जौँकों की व्याख्या करा दी है । (संग्रह में चार-पाँच अंगुल की जौँक का उपयोग पुरुष के लिये कहा है । स्त्री जौँक का उपयोग आचारकालीन और अल्प दोषवाले रोग में—पुरुष जौँक का इनसे विपरीत रोगों में कहा है) ॥१२॥

तासां यवनपाण्ड्यसह्यपौतनादीनि क्षेत्राणि, तेषु महागरीरा बलवत्यः शीघ्रपायिन्यो महागन्ता निर्विषाश्च विरोषेण भवन्ति ॥१३॥

इन निर्विष जलौकाओं के प्रशस्त क्षेत्र—यवन (वुरुष्क देश-टर्की), पाण्ड्य (दक्षिण देश के देश) सह्य (नर्मदा के परे की पर्वत माला), पौतन (मथुरा प्रदेश) आदि क्षेत्र हैं । इन क्षेत्रों में—बड़े शरीरवाली, बलवान्, शीघ्र रक्त की पीने-वाली बहुत खानेवाली विष रहित—(खासकर) होती हैं । (जौँक साधारणतः एक से दो ड्राम रक्त पीती है) ॥१३॥

तत्र, सविषमत्स्यकीटदुर्दुर्भूतपुरीषकोथजाताः कलुषेण्वम्भसु च सविषाः, पद्मोत्पलनलिनकुमुदसौगन्धिक-कुवलयपुण्डरीकशैवलकोथजाता विमलेण्वम्भसु च निर्विषाः ॥१४॥

विषैले, मछली, कीट, मेंढक मूत्र-मल द्वारा सड़े मलिन पानी में उत्पन्न जौँक विषैली होती है । कमल, उत्पल, (थोड़ा नीला), नलिन (थोड़ा लाल), कुमुद, सौगन्धिक (चन्द्रोदय में खिलनेवाला), कुवलय (लाल कमल), पुण्डरीक (बहुत श्वेत कमल), शैवाल (सरवाल) द्वारा सड़े अथवा निर्मल पानी में उत्पन्न जौँक विषरहित होती है ॥ १४ ॥

भवति चात्र— क्षेत्रेषु विचरन्त्येताः सलिङ्गत्वामुगन्विषु । न च संकीर्णचारिण्यो न च पङ्कगयाः सुखाः ॥१५॥

कहा भी है— ये पूर्वोक्त निर्विष जलौकायें-बहुत पानीवाले, सुगन्धित क्षेत्रों में रहती हैं । विष आदि विरुद्ध आहार को नहीं खाती—(सरवाल आदि खाती हैं) । कीचड़ में नहीं सोती, अपितु तृणोदक-पत्र आदि में सोती हैं । इसीलिये सुखदायक होती हैं ॥१५॥

तासां ग्रहणमार्द्वचर्मणा, अन्यैर्वा प्रयोगैर्गृह्णीयात् ॥१६॥ इन जौँकों को गीले चमड़े से अथवा तुरन्त मारे पशु की मांस-पेशी पर घी मक्खन आदि मलकर पकड़ना चाहिये । शस्त्रकाल में पकड़ना चाहिये ॥१६॥

अथैनां नवे महति घटे सरस्तडागोदकपङ्कमावाप्य निदध्यात्, भदयार्थं चासामुपहरेच्छैवल् वल्लूरौदकांश्च

१ पाण्ड्य देश— “काम्बोजाद्दक्षभागो तु इन्द्रप्रस्थान्च पश्चिमे । पाण्ड्यदेशो महेशानि, महाशूरत्वाकारः ॥”