सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[अ० १३]
मथ या बत्ती जलाकर ( इसकी वायु निकालकर ) फिर स्थान पर लगाना चाहिये ।
वि० मन्तव्य—गो के सोंग की टोपी जो ४-६ अंगुल लम्बी होती है लैकर स्वच्छ कर ली जाती है, उसके अग्रभाग में सरसों या राई का सा लिद्र कर लिया जाता है, मूल को घिसकर सम कर लिया जाता है, वह खोखली होती है । इसको 'सिंगी' कहते हैं और पञ्जाब में 'फोकी' कहते हैं । यह मांसल स्थान पर लगाई जाती है और लगती भी वहीं है, अन्यत्र न लगाई जाती है और न लगती ही है । सिंगी लगाने का व्यवसाय पञ्जाब में केवल चमार जाति ( जो झाड़ू लगाना आदि काम करती है ) की स्त्रियाँ ही करती हैं ( अन्य देशों के विषय में हमें कुछ जानकारी नहीं है ) । इस सिंगी का उपयोग दो प्रकार का है—१—कच्चा और २—पक्का ।
१—कच्चा वह है—जिसमें पच्छ न लगाकर केवल वायु का आचरण किया जाता है ।
२—पक्का वह है—जिसमें-पच्छ लगाकर वायु तथा वात दूषित रक्त का आचूषण किया जाता है ।
विधि—जिस स्थान पर सिंगी लगानी होती है उस स्थान पर सिंगी धरकर, हाथ से पकड़कर-दबाकर मुख से वायु का आचूषण किया जाता है—जोर से चूसकर सिंगी के छेद पर दबाकर अंगुली रख ली जाती है अथवा मोमी कागज का टुकड़ा चिपका दिया जाता है अथवा मकड़ी का श्वेत जाला जो छिद्रहित होता है चिपका दिया जाता है, जिससे उसमें वायु का प्रवेश न हो ।
३० मिनट से १ घण्टा (घड़ी दो घड़ी) प्रतीक्षा की जाती है, तत्पश्चात्—छिद्र का अवरोध हटा दिया जाता है, तब सिंगी सरलता से अलग हो जाती है । जहाँ सिंगी लगाई गई वह स्थान उभरा—ऊँचा हो जाता है । उसे सरल २ कर पूर्ववत् कर दिया जाता है और पक्की सिंगी के स्थान पर हल्दों का चन्दन लगा दिया जाता है ।
अलाबू-तुम्भी की भी यही कथा है, परन्तु उसमें छिद्र नहीं किया जाता तथा आचूषण भी नहीं किया जाता ।
- १ श्यंगुलास्य भवेच्छूयां चूषणं शृण्वतः सुन्दरम् ।
- अग्रे सिद्धार्थकच्छिद्रं सुन्दरं चूचुकाकृतिम् ।
- स्याद् द्वादशांगुलांशलाबु नाहं त्वष्टादशांगुलः ।
- चतुस्त्यंगुलवृत्तास्थो दीप्तोऽन्तः श्लेष्मरक्तहृतः ॥
- शुद्ध-अलाबूप्राण—
- विषाणं श्वेतगोरिन्दुचक्रं सप्तंगुलायतम् ।
- चिप्ताऽन्तः पिचुपेशोकं योज्यं वातयुतेऽसृजि ॥
- अष्टांगुलपरीणाहा चतुरंगुलनालसमिता सुमुखी ।
- कृष्णमृदा लिप्ततनूः श्रेष्ठा रक्तावसेचनेऽलाबुः ॥
लगाने की विधि—जहाँ लगानी हो वहाँ आर्द्र मिट्टी का या सने आटे का दिया रख उसमें कपूर अथवा स्नेह वर्त्ति जलाओ और उसकी लो पर तुम्भी को औंधी (अधोमुख) करके तपाओ तप जाने पर वहीं धरकर दबा दो, दवाते ही दीपक बुझ जाता है और तुम्भी में आकर्षण प्रतीत होने लगता है । घड़ी दो घड़ी प्रतीक्षा करो, तत्पश्चात् एक ओर से अथवा सब ओर से शरीरावयव को अंगुली दबाकर तुम्भी को अलगकर तुम्भी के अभाव में पीतल का अथवा काच का गिलास भी लगाया जाता है—विधि यही है । लोटा लग सकता है, परन्तु लगाना नहीं चाहिये, उसमें व्यापद् हो सकती है । तुम्भी भी कच्ची एवं पक्की दोनों प्रकार की होती है । सान्तरदीपका—तुम्भी के भीतर यदि दीपक जलाया जाय तो दीपक को निकालकर तत्काल तुम्भी लगाओ दीपक समेत नहीं । अन्यथा शरीरावयव जल सकता है । इनके द्वारा वायु एवं रक्त का आचूषण हो जाने पर तज्जन्य वेदना शान्त हो जाती है ॥१॥
जलमासामायुरिति जलायुकाः; जलमासामोक इति जलौकसः ॥१॥
जलायुका शब्द की निरुक्ति—इनको जल ही आयु है, या जल में ही इनका धर है, इसलिए इनको 'जलायुका' कहते हैं ।
वि० मन्तव्य—जौकों का जल ही आयु अर्थात् जीवन है, अतः उनका नाम 'जलायुका' और जल ही उनका ओकस-धर है, अतः उनका नाम 'जलौकस' है ।
जौक लगाने का व्यवसाय करनेवालों का नाम 'जौक-यारा' है । वे जौकों को पाल या पकड़ रखते हैं । जौक जैसे २ रक्त चूसती है वैसे फूलतो-बढ़ती जाती है, जौकयारा जब समझ लेता है कि उसका उदर भर गया है । तब उसे छुड़ा लेता है और आवश्यकतानुसार दूसरी तीसरी जौक लगा देता है । एक दिन का अन्तर देकर जौक दो बार लगाना चाहिये । अधिक रक्त निकालने के लिए एक से अधिक जौके एक साथ भी लगाई जाती हैं । जौक लगाना रक्तस्रावण का मनु उपाय है ॥
ताः द्वादश, तासां सविषाः षट्, तावत्य एव निर्विषाः ॥१०॥
ये जलायुका-बारह प्रकार की हैं । जिनमें छे विष युक्त और छे निर्विष (विष रहित) हैं ॥१०॥
तत्र सविषाः—कृष्णा, कर्तुरा, अलगर्दा, इन्द्रायुधा, सासुद्रिका, गोचन्दना चेति । तासु, अञ्जनचूर्णवर्णा पृथुगिराः कृष्णा, वमिमत्स्यवदायता छिन्नोन्नतकुम्भि कर्तुरा, रोमशा महापाशर्वा कृष्णमुखी अलगर्दा, इन्द्रायुधवद्धर्वराजिभिश्चित्रा इन्द्रायुधा, ईषदसितपीतिका विचित्रमुष्पाकृतिचित्रा सासुद्रिका, गोवृषणवद्धोभागे द्विधाभूताकृतिरणुमुखी गोचन्दनेति । तामिदंष्ट्रे पुरषे