सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३३ ]
सूत्रस्थानम्
४५
वमन, ज्वर इस प्रकार से शान्त हो जाते हैं। दाह-मूर्छा, प्यास, आधमान, तीव्र-श्वास एवं कास-मधुर, अम्ल, लक्षण और कटु रसवाले गराशों (कबलों) से शान्त हो जाते हैं। इन्द्रियों के विषयों को भली प्रकार से ग्रहण करता है और मन भी प्रसन्न हो जाता है। शास्त्र को जाननेवाला वैद्य मात्रा में इस रोगी को शिरोविरेचन देवे। इससे रोगी की दृष्टि साफ हो जाती है। अविदाही, लघु, स्निग्ध भोजन इसको देना चाहिये।
उष्णवातातपैर्दग्धे शीतः कार्या विधिः सदा। शीतवर्षांनिलैर्दग्धे स्निग्धमुष्णं च शस्यते ॥३८॥
तथाऽतितेजसा दग्धे सिद्धिर्नास्ति कथंचन। इन्द्रवज्राग्निदग्धेऽपि जीवति प्रतिकारयेत् ॥
स्नेहाभ्यङ्गपरीषेकः प्रदेहैरुच्यते तथा भिषक् ॥३९॥
उष्ण वात ( लू लगने पर ), धूप ( sunstroke ) से जलने पर शीतल किया करनी चाहिये। शीत ( बर्फ हिम से ), वर्षा ( क्षंशावात ) मिश्रित वायु से दग्ध होने पर उष्ण एवं स्निग्ध किया करनी चाहिये। अतितेजस (वज्राग्नि) से जलने पर मनुष्य नहीं बचता। इन्द्राग्नि ( विजली ) से जलने पर यदि मनुष्य जीवित हो तो-स्नेह, अभ्यङ्ग परिषेक, प्रदेहों से चिकित्सा करनी चाहिये।
वि० मन्तव्य—हिमालय पर कभी-कभी ऐसा शीत (बर्फ) तथा वर्षा पड़ती है और वायु चलती है जिससे प्राणी-वृक्ष पौधे झुलस जाते हैं, कभी-कभी—हिमालय की तराई में ऐसा होता है ॥३८, ३९॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थानेऽग्निनिकर्माविधिर्नाम द्वादशोऽध्यायः ॥३१॥
त्रयोदशोऽध्यायः ✓
अथातो जलौकावचारणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥३॥
इसके आगे 'जलौकावचारणीय' अध्याय का व्याख्यान करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१, ३॥
नुपादचवालस्थविरभीरुदुर्बलनारीसुकुमारणाभुमृ- हार्य परमसुकुमारोऽयं शोणितवसेचनोपायोऽभिहितो जलौकसः ॥३॥
१ धूमोपहत, शीताभिहत, अशनिहत की चिकित्सा के लिये देखिये—व्यवहारायुर्वेद, न्यायवेद्यक या Medical Jurisprudence.
२ जलने पर आजकल कैरन औयल (जुने के पानी और तेल को मथकर तुरन्त बनाया) या टैनिक एसिड की मलहम बरतनी चाहिये। शतघीत घृत या पानी में घोया घी भी बही लाभ करता है। इसके लगाने से उष्णमा बाहर आती है, इससे शान्ति मिलती है। इसी से कहा है—
जौक का विषय—रूप, धनी, वृद्ध, भीरु, दुर्बल, स्त्री, कोमल प्रकृतिवाले पुरुषों के उपकार के लिये रक्तावसेचन कार्य में जौक का उपयोग अत्यन्त कोमल उपाय है। प्रच्छन एवं सिरा व्यधन कष्टदायी है ॥३॥
तत्र वातपित्तकफदुष्टशोणितं यथासंख्यं श्रृङ्गजलौ- कालाबुभिरवसेचयेद्विशेषतस्तु विज्ञातव्यं सर्वाणि सर्वैर्वा ॥
इनमें वात से दूषित रक्त को सींगों से, पित्त से दूषित रक्त को जौक से, और कफ से दूषित रक्त को अलाबु से निकालना चाहिये। अथवा—विज्ञातव्य रक्त को इन तीनों से ही निकालना चाहिये। क्योंकि ये उपकरण स्निग्ध, शीत एवं रूक्ष हैं ॥४॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
उष्णं समुधुरं स्निग्धं गवां शृंगं प्रकीर्तितम् ।
तस्माद्व्रातोपसृष्टे तु हितं तदवसेचने ॥५॥
शीताधिवासा मधुरा जलौका वारिसंभवा ।
तस्मात् पित्तोपसृष्टे तु हिता सा त्ववसेचने ॥६॥
अलाबु कटुकं रूक्षं तीक्ष्णं च परिकीर्तितम् ।
तस्माच्छ्लेष्मोपसृष्टे तु हितं तदवसेचने ॥७॥
कहा भी है—
गाय का सींग—उष्णवीर्य, मधुर, स्निग्ध गुणवाला है। इसलिये वातदूषित रक्त को निकालने के लिये श्रेष्ठ है। जौक-शीत घर में अर्थात् जल में रहती हैं, मधुर हैं और पानी से उत्पन्न होती हैं। इसलिये पित्तदूषित रक्त को निकालने के लिये उत्तम हैं। अलाबु (तुम्भी) कटुरस, रूक्ष एवं तीक्ष्ण है। इस-लिये कफदूषित रक्त को निकालने में प्रशस्त है। चरक में कहा है—
भिषग वातान्वितं रक्तं विषाणेन विनिर्हरेत् ।
पित्तान्वितं जलौकाभिः कफान्वितमलाबुभिः ।
चरक चि० अ० २१ ॥५७॥
तत्र प्रच्छिते तनुवक्षपटलावनन्देन श्रृङ्गेण शोणित- मवसेचयेदाचूषणात्, सान्तरदीप्याऽलाबूना ॥८॥
स्थान पर पन्थ लगाकर पतले वस्त्र से ढाँपकर सींग द्वारा रक्त का आचूषण करना चाहिये। अथवा अलाबु में तिनके
स्थाने रक्ते हिमेनोप्यानिष्कमेऽनुगतो बहिः । वेदना वर्धते तेन शघिरं च विदद्यते ॥
उष्णं निष्कामयन् कुर्थात् ऊष्माणं मन्दतां रजः ।
तस्मात् सुखयति ह्युष्णं न तु शीतं कथंचन ॥
१ वाग्भटु में निम्न विधि बताई है—
प्रच्छानेनैकदेशस्थं भषितं जलजन्मभिः ।
हरेत् श्रृङ्गादिभिः सुप्तमसूष्यापि शिरान्व्यधैः ॥१॥
पूच्छानं पिण्डिते वा स्यादवगाढे जलौकसः ।
त्वकस्थेऽलाबुघटिष्टुङ्गं शिरं व्यापकेऽसृजि ॥२॥