सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १३ ]
वि० मन्तव्य—प्लुष्ट का अग्नि द्वारा प्रतपन-तपाना अर्थ है जुलाना नहीं ॥ २६-२९ ॥
शीतामुष्णां च दुर्दग्धे क्रियां कुर्याद्विषक् पुनः । घृतालेपनसेकांस्तु शीतानेवास्थ कारयेत् ॥ २२ ॥
दुर्दग्ध अवस्था में वैद्य को शीतल एवं उष्ण क्रिया करनी चाहिये। मूल भाग के जलने पर स्विन्नरक्त के निर्वापण के लिये शीतल क्रिया करनी चाहिए। यदि बहुत अधिक भाग न जला हो तो स्विन्नरक्त को पिघलाने के लिए उष्ण क्रिया करनी चाहिए। (अतिशय दाह में शीत क्रिया, बहुत न जलने पर उष्ण क्रिया करनी चाहिए)। घी का आलेपन आदि एवं क्वाथ आदि से सेचन ठण्डी अवस्था में करना चाहिए ॥ २२ ॥
सम्यग्दग्धे तुगाक्षीरोप्लक्षचन्दनगैरिकैः ।
सामृतः सर्पिषा स्निग्धैरालेपं कारयेद्विषक् ॥ २३ ॥
प्राग्न्यान्तुपौदकैश्चैत्रं पिष्टैर्मांसैः प्रलेपयेत् ।
पित्तविद्रधिष्वचैत्रं संततोऽभाणमाचरेत् ॥ २४ ॥
सम्यक् दग्ध अवस्था में— बंशलोचन, पिलखन, चन्दन लाल, गेरु, गिलोय, इनको घी में मिलाकर आलेप करना चाहिए। वात शान्ति के लिए—अश्व आदि आन्तु पशुओं के मांस को पीसकर लेप करना चाहिए। सम्यक् दग्ध अवस्था में निरन्तर दाह होने पर पित्तविद्रधि के समान चिकित्सा करनी चाहिए ॥ २३, २४ ॥
अतिदग्धे विशेषाणि मांसाण्युद्धृश्य शीतलाम् ।
क्रियां कुर्याद्विषक् पश्चाच्छालितण्डुलकण्डनैः ॥ २५ ॥
तिन्दुकीत्वकपालैर्वा घृतमिश्रैः प्रलेपयेत् ।
व्रणः गुडूचोपत्रैर्वा छादयेद्यवौदकैः ॥ २६ ॥
क्रियां च निखिलां कुर्याद्विषक् पित्तविसर्पवत् ।
अति दग्ध को अवस्था में लटकें हुए मांस को निकालकर शीतल क्रिया करनी चाहिए। पीछे से धान्य के चावलों के कणों को या—तिन्दुकी की छाल एवं मिट्टी के खपरे को घी में मिलाकर प्रलेप करना चाहिए। पीछे से गिलोय के पत्रों से या कमल आदि पानी में उत्पन्न वृक्षों के पत्तों से व्रणों को ढाँप देना चाहिए। वैद्य को चाहिए कि पित्त-विषर्प के समान सम्पूर्ण क्रिया करे। पित्त-रक्त से आक्रान्त व्रण-गिलोय पत्र आदि के ढाँपने से गरमी को छोड़कर शीघ्र मरता है। ('तिन्दुकीत्वकपालैः' के स्थान पर 'तिन्दुकीत्वककृषायैः' यह पाठ भी है) ॥ २५, २६ ॥
मधुच्छिष्टं समधुक् रोधं सर्जरसं तथा ॥ २७ ॥
मज्जिष्ठां चन्दनं मूर्वा पिष्ट्वा सर्पिविपाचयेत् ।
सवषामग्निदग्धानामेतद्रोषणमुत्तमम् ॥ २८ ॥
स्नेहदग्धे क्रियां रूक्षां विशेषेणावचारयेत् ।
मधुच्छिष्टं (मौम), मुलहट्टी, पठानी लोघ, राल, मजीठ, लालचन्दन, मूर्वा, इनको पीसकर घी सिद्ध करना चाहिए। यह सब प्रकार के जले हुए व्रणों में हितकारी है।
तैलादि स्नेह से जलने पर रूक्ष क्रिया को विशेष रूपसे करना चाहिए रूक्ष दग्ध अवस्था में स्नेहन क्रिया करनी चाहिए ॥ २७, २८ ॥
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि धूमोपहतलक्षणम् ॥ २९ ॥
श्वसिति क्षीति चात्यर्थमत्याधमति कासते ।
चक्षुषोः परिदाहश्च रागश्चैवोपजायते ॥ ३० ॥
सधूमकं निःश्वसिति घ्रेयमन्यत्र वेत्ति च ।
तथैव च रसान् सर्वान् श्रुतिश्चास्योपहन्यते ॥ ३१ ॥
तृष्णादाहश्चरयुतः सौदत्यथ च मूर्च्छति ।
धूमोपहत इत्येषः, शृणु तस्य चिकित्सितम् ॥ ३२ ॥
इसके आगे धूम से पीड़ित व्यक्तियों के लक्षण कहते हैं। रोगी कठिनाई से श्वास लेता है, छाँकें आती हैं। बहुत आश्मन होता है, खांसता है, आंखों में जलन होती है, आँखें लाल होती हैं। श्वास में धूम की गन्ध आती है किसी दूसरी गन्ध को नहीं पहचानता। सब प्रकार के रसों को नहीं पहिचानता। रोगी की सुनने की शक्ति नष्ट हो जाती है। तृष्णा, दाह, ज्वर होता है, मूर्च्छा होती है, ये धूम से पीड़ित व्यक्ति के लक्षण होते हैं। इसकी चिकित्सा सुनिष्ट ।
वि० मन्तव्य—अधिक धूमपान से, अधिक समय धूम में रहने से उक्त लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं और सौदति-अवसाद-शिथिलता हो जाती है, और मृत्यु हो जाती है। अनेक बार सुना है कि-किवाड़ बन्द करके, कोयले सुलगाकर कुछ व्यक्ति सो गए और सोये ही रह गये। इस प्रकार धूम के प्रभाव से नर की अपेक्षा नारी की मृत्यु शीघ्र होती है। पशु और भी शीघ्र मरते देखे गए हैं ॥ २९-३२ ॥
सर्पिरिजुरसं द्राक्षां पयो वा शर्कराम्बु वा ।
मधुराम्बु रसौ वाऽपि वमनाय प्रदापयेत् ॥ ३३ ॥
वमनः कोष्ठशुद्धिः स्याद् धूमगन्धश्च नश्यति ।
विधिनाऽनेन ग्राम्यन्ति सदन्मक्षवशुज्वराः ॥ ३४ ॥
दाहमूर्च्छागुड्डाधमान्नासकासाश्च दारुणाः ।
मधुरैलेवणाम्लैश्च कटुकैः कवलमहैः ॥ ३५ ॥
सम्यग्गुह्णातीन्द्रियाथीन् मनश्चास्य प्रसीदति ।
शिरोविरेचनं चास्मै दद्याद्योगेन शाखवित् ॥ ३६ ॥
पृष्ठिविशुध्यते चास्य शिरोग्रीवं च देहिनः ।
अविदाहि लघु स्निग्धमाहारं चास्य कल्पयेत् ॥ ३७ ॥
वमन के लिए—घी, गन्ने का रस, किसमिसों का पानी, शर्करा का पानी, मधुर अम्ल (खट्टा-मीठा) रस देना चाहिए। वमन होने से कोष्ठ की शुद्धि हो जाती है और धूम की गन्ध नष्ट होती है। अन्न की ग्लानि,