भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १४ ]

रिमेदमेषश्चक्षुधधन्वन्त्वभिर्वा चूर्णिताभिः क्षौमेण वा ध्मापितेन, समुद्रफेनलाक्षाचूर्णैर्वा, यथोक्तैर्घ्रणबन्धनद्रव्यैर्गोठं बन्धीयात्, शीवाच्छादनमोजनागारैः शीतैः प्रदेहपरिषेकैश्चोपचरेत्, क्षारेणामिना वा दहेद्यथोकं, व्यधादनन्तरं तामेवातिप्रवृत्तां सिरां विध्येत्, काकोल्यादिकाथं वा शर्करामधुमधुरं पाययेत्, एणहरिणोरभ्रगशमहिषवराहणां वा रुधिरं क्षीरपयुषरसैः सुस्निग्धैश्चाशनीयात्, उपद्रवांश्च यथास्वमुपचरेत् ॥३६॥

रक्त के बहुत अधिक बहाव पर-पटानीलोष, मधुक (मुलहडी), प्रियंगु (फूलप्रियंगु), पत्तंग (लाल चन्दन), गैरिक (गेरु), सर्जरस (राल), रसांजन (रसौत), शाल्मली—पुष्प (सिम्बल का फूल), शंख, शुक्ति (सीप), माष (उड़द), जौ एवं गेहूँ—इनके चूर्ण को ब्रण के मुख में धीरे धीरे प्रक्षेप करके—अंगुली के अग्रभाग से दवा देना चाहिये। साल, सर्ज, अर्जुन, अरिमेद, मेदाश्रुङ्गी, धव, धामन, इनकी छाल के चूर्णों को शहद में मिलाकर या भस्म किये समुद्रफेन, लाक्षाचूर्ण को शहद में मिलाकर-क्षौम, वस्त्र आदि ब्रणबन्धन द्रव्यों से कसकर बाँध देना चाहिये। शीतल-भोजन, शीतल-आच्छादन, शीतल घर, शीतल परिषेचन, एवं शीतल प्रदेह वरतने चाहिये। क्षार अथवा अग्नि से जलाना चाहिये, या सिराव्यधन के अनन्तर जिससे रक्त अधिक बह रहा हो, उसी सिरा को फिर बाँधना चाहिये। काकोल्यादि (गण) (क्वाथ) शर्करा एवं मधु से मीठा करके पिलाना चाहिये। एण (काला हरिण), हरिण, उरभ्र, शश, महिष अथवा वराह का रक्त पिलाना चाहिये। दूध, मूळ का यूप, मांसरस—इनको घी से भली प्रकार स्निग्ध-शोभन रूप में खिलाना चाहिये। शिरोरोग आदि उपद्रवों की चिकित्सा करनी चाहिये।

वि० मन्तव्य—क्षौमेण वा ध्मापितेन—अर्थात् रेसमी कपड़ा को जलाकर उसकी राख को बुरकना चाहिये। व्यधादनन्तरं.....विध्येत्-अर्थात्-जहाँ व्यध या वेध करने से रक्त की अति प्रवृत्ति हो रही है वहाँ से कुछ ऊपर उसी सिरा का वेध करे। फलतः रक्त का वेग दो भागों में बँट जाता है और रोकने में सरलता होती है। काकोल्यादि.....श्रीयात्-अर्थात् काकोल्यादि जीवनीय द्रव्यों का क्वाथ पीने से—जीवन रक्षा होती है और—एण आदि प्राणियों का रक्त पीने से रक्त की क्षति पूर्ति हो जाती है और क्षीर आदि सेवन से बल लाभ

१ आजकल टांका लगाना, पीडन, घमनीसंदश या अङ्ग को कूँचा करके भी रक्त को बन्द करते हैं। शल्यकर्म में प्रायः घमनी संदश और टांका लगाना या बाँध देना प्रायः बरता जाता है।

होता है। उक्त सब उपचार चोट आदि से होनेवाले रक्तखाव में भी किये जायें ॥३६॥

कहा भी है— भवन्ति चात्र—

धातुक्षयात् सुते रक्ते मन्दः संजायतेऽनलः। पवनश्च परं कोपं याति तस्मात् प्रयत्नतः ॥३७॥ तं नातिशीतैर्लघुभिः स्निग्धैः शोणितवर्धनैः। ईषदम्लैरनम्लैर्वा भोजनैः समुपाचरेत् ॥३८॥

रक्त के अधिक निकलने पर-धातु के क्षय होने पर अग्नि मन्द हो जाती है। वायु बहुत अधिक कुपित होती है। इसलिये प्रयत्न पूर्वक न बहुत शीतल, लघु, स्निग्ध, रक्तवर्धक, थोड़े खड़े (अनार या आँवला), या बिल्कुल खड़ाश रहित (मधुर) भोजनों को खिलाना चाहिये ॥३७,३८॥

चतुर्विधं यदेतद्वि रुधिरस्य निवारणम्। संधानं स्कन्दनं चैव पाचनं दहनं तथा ॥३९॥ ब्रणं कषायः संधत्ते रक्तं स्कन्दयते हिमम्। तथा संपाचयेद्भस्म दाहः संकोचयेत् सिराः ॥४०॥

रक्त को रोकने के चार उपाय हैं। यथा-सन्धान, स्कन्दन, पाचन और दहन। इनमें कषाय रस—ब्रण को जोड़ देता है—मिलता है। शीत क्रिया रक्त को जमाती-घट करती है। रेसम आदि की भस्म पाचन करती है, और दाह-क्रिया सिरा को संकुचित कर देती है ॥३९,४०॥

अस्कन्दमाने रुधिरं संधानानि प्रयोजयेत्। संधाने अश्रयमाने तु पाचनैः समुपाचरेत् ॥४१॥ कल्पैरेतेक्ष्निभिर्वैद्यः प्रयतेत यथाविधि। असिद्धिमत्सु चैतेषु दाहः परम इष्यते ॥४२॥ शेषदोषे यतो रक्ते न व्याधिरतिवर्तते।

सावशेषे ततः स्थैर्यं न तु कुर्यादतिक्रमम् ॥४३॥ रक्त के निकलने पर प्रथम शीतोपचारादि करना चाहिये। यदि इससे भी रक्त न रुके तो हरीतकी या पञ्चवल्कल प्रयोग करना चाहिये। सन्धानक्रिया से भी यदि रक्त न रुके तो पाचन भस्म वरतनी चाहिये। जहाँ तक बने वैद्य को इन्हीं तीनों विधियों से कार्य करना चाहिये। इन सब के असफल होने पर दाहक्रिया करनी चाहिये। दाहक्रिया रक्त को बन्द करने के लिये अच्छा उपाय है ॥४१,४२॥

१ चरक में कहा है— नात्युष्णशीतं लघु दीपनीयं रक्तेऽपनीते हितमन्नपानम्। तदा शरीरं हानवस्थितासु अग्निविशेषेण च रक्षितव्यः ॥ (२) बलदोषप्रमाणं वा विशुद्ध्या रुधिरस्य च।

रुधिरं श्रावयेज्जन्तोराशयं प्रसमीह्य वा ॥

च० सू० अ० २४