भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० १५ ]

सूत्रस्थानम्

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क्योंकि रक्त में दोष के शेष रहने पर रोग वृद्धि को प्राप्त नहीं होता । ( अतः रक्त के अन्दर थोड़ा सा दोष रहने पर संशमनादिकार्य द्वारा रोग शान्ति करनी चाहिये ) । इसलिये कुछ वृषित रक्त छोड़कर ही रोक देना चाहिये, परन्तु रक्तखाव का अतियोग नहीं करना चाहिये ॥४३॥

देहस्य रुधिरं मूलं रुधिरैर्गैव धार्यते ।

तस्माद्यत्नेन संरक्ष्यं रक्तं जीव इति स्थितिः ॥४४॥

शरीर का मूल—(उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय का कारण) रक्त ही है, रक्त से ही शरीर का धारण होता है । इसलिये यत्नपूर्वक रक्त की रक्षा करनी चाहिये—रक्त ही जीव है—यह स्थिति है ॥४४॥

क्षुत रक्तस्य सेकाद्यैः शीतैः प्रकृपितेऽनिले ।

शोफं सतोदं कोष्णेन सर्पिषा परिषेचयेत् ॥४५॥

रक्तावशेष में पश्चात्कर्म—रक्तखाव होने पर शीत-परिषेक आदि से वायु का यदि कोप हो जाये एवं सृजन तथा पीड़ा हो तो कवोष्ण घी का उस स्थान पर सेचन करना चाहिये ॥४५॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने शोणितवर्णनीयो

नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥

पञ्चदशोऽध्यायः

अथातो दोषधातुमलक्षयवृद्धिविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः । यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१,२॥

इसके आगे दोष ( वातादि ), धातु ( रसादि और उपधातु ), मल ( पुरीषादि ), इनके क्षय एवं वृद्धि को बताने के लिये इस अध्याय का अवतरण करते हैं । जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥

दोषधातुमलमूलं हि शरीरं, तस्मादेतेषां लक्षणमुच्यमानमुपधारय ॥३॥

हे सुश्रुत ! जिस प्रकार वृक्षों की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय में मूल ही प्रधान है, उसी प्रकार शरीर की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय में दोष धातु एवं मल कारणभूत हैं ! इसलिये इनके वर्णित लक्षणों को सुनो ॥३॥

तत्र, प्रस्पर्दनोद्वहनपूर्णविवेकधारणलक्षणो वायुः पञ्चधा प्रविभक्तः शरीरं धारयति, रागपक्त्योजस्तेजोमेघोष्मकृतं पित्तं पञ्चधा प्रविभक्तमग्निर्मर्णाऽनुग्रहं करोति,

१ शरीर से अधिक से अधिक रक्त साढ़े तेरह पल निकलना चाहिये—

परं प्रमाणमिच्छन्ति प्रस्थशोणितमोक्षणं ।

वमने च विरेके च तथा—शोणितमोचने ।

सार्वत्रयोद्विषफलं प्रस्थमाद्भूमनीषिणः ।

सन्धिंसंरुलेषणस्नेहन्रोपणपूर्णबलस्यैर्यक्तुं श्लेष्मा पञ्चधा प्रविभक्त उदककर्मणाऽनुग्रहं करोति ॥४॥

इनमें—प्रस्पर्दन (शरीर का चालन-व्यान वायु का कार्य), उद्वहन (इन्द्रिय विषयों का धारण करना-उदान कर्म), पूर्ण (आहार द्वारा भरना-प्राणकर्म), विवेक (रस, मूत्र और पुरीष का पृथक् करना समान वायु का कर्म), धारण (शुक्र मूत्रादि का वेगोपस्थिति में कर्म करना और आवेगकाल में धारण करना अपान वायु का कर्म), इस प्रकार प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान रूप में विभक्त होकर वायु शरीर को धारण करती है ।

प्रकृतिस्थ पित्त—रागकृत (रस को रंगना-रंजकाग्निपित्त), पक्तिकृत (आहार का पकाना—पाचकाग्निपित्त), ओजकृत (हृदय में स्थिति—सोमरूप-साधक), तेजकृत (दृष्टिकारक आलोचक), मेधाकृत (बुद्धि को करनेवाला—साधक), ऊष्मकृत (शरीर की गरमी को करनेवाला—स्वचा में स्थित, प्राजक), इस प्रकार—पाचक, रजक, साधक, आलोचक, प्राजक मेद से पाँच भागों में विभक्त हुआ पित्त अग्निर्मर्णा से शरीर का उपकार करता है ॥

प्रकृतिस्थ कफ—सन्धिक्तु (सन्धिवन्धन करता है—श्लेष्मक), स्नेहनक्तु (शरीर को स्निग्ध करता है—क्लेदक), रोपणक्तु (ब्रण का भरनेवाला—सौष्य होने से—बोधक), पूर्णक्तु (बहुतमूर्त होने से शरीर को भरनेवाला), बल एवं स्थिरता करनेवाला (अवलम्बक), इस प्रकार श्लेष्मक, क्लेदक, बोधक, तर्पक, अवलम्बक मेद से पाँच प्रकार का कफ उदककर्म द्वारा शरीर का उपकार करता है ।

रसस्तुष्टिं प्रीणनं रक्तपुष्टिं च करोति, रक्तं वर्णप्रसादं मांसपुष्टिं जीवयति च, मांसं शरीरपुष्टिं मेदसन्न, मेदः स्नेहस्वेदौ दृढत्वं पुष्टिमस्थतां च, अस्थितिं देहधारणं मज्जाः पुष्टिं च, मज्जा स्नेहं बलं शुक्रपुष्टिं पूर्णमस्थतां च करोति, शुक्रं घैर्यं च्यवनं प्रीतिं देहबलं हर्षं बीजार्थं च ॥१॥

रस—सन्तोष, शरीर का प्रीणन और रक्त का पोषण करता है । रक्त—वर्ण की निर्मलता, मांस का पोषण और जीवन देता है । मांस—शरीर एवं मेद का पोषण करता है । मेद—स्नेह-स्वेद उत्पन्न करता है, शरीर में दृढ़ता और अस्थियों का पोषण करता है । अस्थि-शरीर को धारण करती है और मज्जा—प्रीति, स्नेह, बल, शुक्र का पोषण और अस्थियों

१ मेधा एवं ओज का साधक होने से पित्त को साधक कहते हैं । योगी लोग हृदय और मूर्दा का एक करके ही भगवान् को पाते हैं । (यथा—मूर्दानामस्य संसौन्ध्य अथवा हृदयं च यत् । अथर्ववेद) ।