सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुभ्रतसंहिता
[ अ० १५ ]
का पोषण करती है। शुक्र-शौर्य, जल्दी क्षरण ( वीर्य का ), प्रीति-स्नेह ( स्त्रियों में ), देह वल ( उत्साह उपचय रूरी ), हर्षवीज ( स्त्रियों में ) और ( गर्भ ) के लाभ के लिये है ॥१॥
पुरीषमुपस्तम्भं वाञ्चप्रिधारणं च, वस्तिपूरणवि- क्लेदकृन्मूर्त्रं, स्वेदः क्लेदत्वक्सौकुमार्यकृत ॥१॥
पुरीष—शरीर का धारण, वायु, अग्नि का अवशम करता है। मूर्त्र—मूत्राशय का भरना, एवं आर्द्रता उत्पन्न करता है। स्वेद—किलन्तता एवं त्वचा में कोमलता उत्पन्न करता है ॥ ( मल के लिये कहा है—सर्वधातुक्षयात्संस्थ बलं तस्य हि विड्वलम् ॥२॥ )
रक्तलक्षणमार्तवं गर्भकृच्छ्रं, गर्भो गर्भलक्षणं स्तन्यं स्तनयोरापीनत्वजननं जीवनं चेति ॥४॥
आर्तव—सम्पूर्ण रक्त के लक्षणों से युक्त एवं गर्भ का करनेवाला है। गर्भ—गर्भ के लक्षण ( चूचुकों में कृष्णता आदि ) उत्पन्न करता है। स्तन्य—दूध स्तनों में भारीपन वृद्धि और बालकों में जीवन देता है ॥५॥
तत्र विधिवत्परिरक्षणं कुर्वीत ॥६॥
इन प्रकृतिस्थ दोष, धातु, मलों की रक्षा मली प्रकार से करनी चाहिये ॥६॥
अत उर्ध्वमेधां क्षीणलक्षणं वद्यामः। तत्र, वातक्षये मन्दचेष्टताऽल्पवाक्त्वमग्रहर्षो मूढसंज्ञता च, पित्तक्षये मन्दोष्माग्निता निष्प्रभता च, श्लेष्मक्षये रूक्षताऽन्तर्द्वीह आमाशयेतरश्लेष्माशयशून्यता सन्धिश्चैथित्यं तृष्णा दौर्बल्यं प्रजागरणं च ॥७॥
इसके आगे इनके क्षीण होने के लक्षणों को कहते हैं। ( इनका क्षय—अतिसंशोधन से, अतिसंशमन से, उपस्थित वेगों के रोकने से, असत्य्य अन्न से, मन के संताप से अति-व्यायाम से, अनशन से, अतिमैथुन से होता है )। इनमें—वायु के क्षय होने पर—शरीर में चेष्टाओं का मन्द होना, अल्पवाक्त्व ( थोड़ा बोलना ), अप्रहर्ष ( अनुष्ठि ) और मूढ संज्ञता ( सम्यक् ज्ञान का नष्ट होना ) होती है। पित्त के क्षय होने पर—उष्णमा एवं अग्नि का मन्द होना तथा निष्प्रभता ( चेहरे पर से तेज में कमी ) आ जाती है। श्लेष्मा के क्षय होने पर—रूक्षता, शरीर के अन्दर जलन, आमाशय एवं उर, कण्ठ, शिर, सन्धियों में शून्यता ( सुप्तता ), सन्धियों में शिथिलता—प्यास का लगना और नींद का न आना होता है। ( क्षीणा जहाति स्वं लिंगं, कर्मणः प्राकृताद् हानिः वृद्धिर्वापि विरोधिनाम्—चरक ) ॥७॥
तत्र स्वयोनिवर्धनान्येव प्रतीकारः ॥८॥
दोषों के क्षय की चिकित्सा—दोषों के क्षय में अपनी योनि (अपने कारण) को बढ़ानेवाले द्रव्यों का (कमों का भी) उपयोग करना चाहिये। यही इनकी चिकित्सा है वायु के क्षय में वात-वर्धक, पित्त के क्षय में अग्निवर्धक, कफ के क्षय में कफवर्धक उपाय करने चाहिये। कफ की योनि रस, पित्त की योनि रक्त। इसलिये रस—रक्तवर्धक, उपाय करने चाहिये। वायु की योनि वायु है। ( धातवः पुनः शारीराः समानगुणैः समानगुणभूषिष्टैः वा वाश्याहारविहारैः अभ्यस्यमानैः वृद्धिं प्राप्नुवन्ति )। कर्मापि यत्रस्थ धातोः वृद्धिकरं तत्तदा संन्यम—चरक० ।
त्रि० मन्तव्य—स्व—अपने तथा योनि—कारण को बढ़ाने-वाले द्रव्यों का उपयोग—सेवन ही प्रतिकार—चिकित्सा है अर्थात् जैसे मांस में—सोषि मांस को बढ़ानेवाले तथा उसके कारण—उत्पादक रक्त को बढ़ानेवाले द्रव्यों का सेवन करना चाहिये ॥८॥
रसक्षये हृत्पीडा कम्पः शून्यता तृष्णा च, शोणित- क्षये त्वकपाकृष्यमल्लशीतप्राथना सिराश्चैथित्यं च, मांस- क्षये स्फिग्गण्डौष्पोरस्थोरुवक्षः कक्षापिण्डिकोदरघ्रोवाशु- ष्कतर रौदयतोदौ गात्राणां सदन् धमनीश्चैथित्यं च, मेदः- क्षये प्लीहाभिबृद्धिः सन्धिशून्यता रौदयं मेदुरमांसप्राथ- ना च, अस्थिक्षयेऽस्थिशूलं दन्तनखभङ्गौ रौदयं च, मज्जक्षयेऽल्पशुक्रता पदमेदोऽस्थितितोदोऽस्थिशून्यता च, शुक्लक्षये मेदवृषणवेदनाऽशक्तिर्मैथुने चिराद्वा प्रसेकः प्रसेके चालपरक्तशुक्रदर्शनम् ॥९॥
रस के क्षय होने पर—हृदय प्रदेश पर पीड़ा, कम्पन, शोष ( मुख का सूखना ), शून्यता और तृष्णा होती है। रक्त का क्षय होने पर—त्वचा में कठोरता, वातवृद्धि के कारण अम्लरसेच्छा, उष्णवृद्धि के कारण शीतेच्छा, और सिराओं में शिथिलता होती है। मांस के क्षय होने पर—नितम्ब, गण्डस्थल, ओष्ठ, मेहन, जंघा, वक्षस्थल, कक्षा, पिण्डलियाँ, उदर, प्रीवा, में शुष्कता, रूक्षता, पीड़ा, अङ्गों का साद और धमनियों में शिथिलता होती है। मेद का क्षय होने पर—प्लीहा का बढ़ना, सन्धियों में शून्यता ( सुप्ति ), रूक्षता एवं अतिस्निग्ध मांस की इच्छा होती है। अस्थि का क्षय होने पर—अस्थियों में वेदना, दांत, नखों का टूटना और रूक्षता होती है। मज्जा का क्षय होने पर—शुक्र की शून्यता, पवों (ग्रन्थियों) में दर्द, अस्थियों में पीड़ा तथा अस्थियों में रिक्ता अनुभव होती है। शुक्र का क्षय होने पर—शिरन एवं अण्डकोषों में दर्द, मैथुनकायं
“तेज ही शुक्र है। तेज का स्थान दृष्टि है। कहा भी है—“तेजो दृष्टिरिति श्यातं-तेजः शुक्रं प्रकीर्तितम्” “वातक्षये शीत- रूक्षेनैवच्यः कटुकादिभिः। पित्तक्षयेऽपि कटुकैः न तु लवणादिभिः क्षीरादिभिः स्निग्धशीतैः प्रतिकुर्यात् कफक्षये ॥