सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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असमर्थता, अथवा किसी प्रकार प्रवृत्ति होने पर भी देर में शुक्र का क्षरण, क्षरण होने पर थोड़ा शुक्र आता है या धातुक्षय के कारण कुपित बायु रक्तमिश्रित शुक्र का क्षरण करती है ॥ ६ ॥
तत्रापि स्वयोनिवर्धनद्रव्योपयोगः प्रतीकारः ॥ १० ॥
धातुओं का क्षय होने पर भी अपने कारण को बढ़ानेवाले द्रव्यों का ( तथा कर्मा का ) उपयोग करना चाहिये। यथा—रक्त से मांस बढ़ता है, मांस से मेद, मेद से अस्थि, तरुण अस्थियों से मज्जा, मज्जा से शुक्र बढ़ता है। समान गुणवाले द्रव्यों का उपयोग—रक्त के क्षय होने पर—तैजस पदार्थों का उपयोग करना चाहिये। द्रव्यों की भाँति कर्मा का भी उपयोग करना चाहिये ॥ १० ॥
पुरीपक्षये हृदयपाशर्वपीड़ा सशब्दस्य च वायोरुर्ध्व-गमनं कुक्षौ संचरणं च सूत्रक्षये वस्तितोदोऽल्पमूत्रता च, अत्रापि स्वयोनिवर्धनद्रव्योपयोगः। स्वेदक्षये स्तब्धरोम-कूपता त्वक्शोषः स्पर्शवैगुण्यं स्वेदनशरूच, तत्राभ्यज्ञः स्वेदोपयोगश्च ॥ ११ ॥
मल के क्षय होने पर—हृदय प्रदेश एवं पाश्वों में पीड़ा शब्द के साथ बायु का ऊपर की ओर गमन करना तथा उदर में गति करना होता है। मूत्र के क्षय होने पर—मूत्राशय में पीड़ा और मूत्र का थोड़ा आना होता है। इन अवस्थाओं में भी अपनी योनि को बढ़ानेवाले—समानगुणी द्रव्यों का उपयोग करना चाहिये। स्वेद के क्षय होने पर रोमकूपों में जड़ता, त्वचा में शुष्कता, स्पर्शज्ञान में विकार और पसीना नहीं आता। इस अवस्था में—तैल की मालिश तथा पसीना देना चाहिये ॥ ११ ॥
आर्तवक्षये यथोचितकालादर्शनमल्पता वा योनि-वेदना च, तत्र संशोधनमानेयानां च द्रव्याणां विधिबद्ध-पयोगः। स्तनक्षये स्तनयोर्म्लीनता स्तन्यासंभवेऽल्पता वा, तत्र श्लेष्मवर्धनद्रव्योपयोगः। गर्भक्षये गर्भास्पन्दनम नुन्नतकुक्षिता च तत्र प्राप्तवस्तिकालायाः क्षीरवस्तिप्रयोगो मेध्यान्नोपयोगश्चेति ॥ १२ ॥
आर्तव के क्षय होने पर—ठीक समय पर आर्तव का न आना अथवा थोड़ा आना, योनि में वेदना होती है। इसके
१ कहा भी है—
“यद्यपि पञ्चभूतानां वाच्यः पाको द्विधा पुनः।
तथाप्यां प्रधानत्वाद् रसः सोम्योऽभिधीयते ॥
अतिरिक्ता गुणा रक्ते वह्निमांसे तु पार्थिवाः।
मेदस्यम्बुभुवोरस्थिन् पृथिव्यन्तिलतेजसाम् ॥
मज्जि शुक्लं वा सोम्यस्य मूत्रेऽम्बुशिविनो गुणाः।
भुवो विस्वार्तत्वे त्यानेय-प्रवेदस्तनयोरपाम् ॥
इति धातुमलैष्वता गुणाः प्राधान्यतः स्थिताः।
प्रायेण भगुणा गर्भे स्तोकाद्यनुग्रहा इति ॥”
लिये संशोधन ( वामक ) द्रव्यों का एवं आग्नेय द्रव्यों ( तिल, माष, सुरा आदि ) का विधिपूर्वक उपयोग करना चाहिये। दूध का क्षय होने पर—स्तनों में म्लीनता, दूध का अभाव अथवा थोड़ा दूध आता है। इस अवस्था में कफवर्धक द्रव्यों का उपयोग करना चाहिये। गर्भ के क्षय होने पर—गर्भ में स्पन्दनों का रुक जाना और उदर में वृद्धि का न होना ( गर्भाशय का उदर में ऊपर न आना ) होता है। इस अवस्था में आठवों मास लग जाने पर दूध की व्याधियाँ एवं दूध की ( बकरे का मांस या वस्त्राण्ड ) आदि मेध्यान्न का उपयोग करना चाहिये। चरक में—गर्भस्त्वामगर्भेन। तत्र पयसां रसानामागर्भाणां च गर्भवृद्धिकरः ॥ १२ ॥
तत्र ऊर्ध्वमतिवृद्धानां दोषधातुमलाणां लक्षणं वदयामः। वृद्धिः पुनरेषां स्वयोनिवर्धनात्म्यपसेवनाद्ववति। तत्र, वातवृद्धौ वाक्पासुष्यं कारयं कारण्यं गात्रस्फुरण-मुण्णकामि-(म)--ता निद्रानाशोऽल्पबलत्वं गाढवचस्त्वं च, पित्तवृद्धौ पीतावभासता संतापः जीतकामिस्त्वल्पनिद्रता मूर्च्छा बलहानिरिन्द्रियदर्बल्यं पीतविण्मूत्रनेत्रत्वं च, श्लेष्मवृद्धौ औकत्यं स्थैर्यं गौरवमवसादस्तन्ना निद्रा सन्धिबिरुलेषश्च ॥ १३ ॥
इसके आगे मात्रा से अधिक बढ़े दोष-धातु-मलों के लक्षणों की व्याख्या करते हैं। इन सबकी वृद्धि अपने कारण को बढ़ानेवाले द्रव्यों के अति सेवन से होती है। वात के बढ़ने पर—वचन में कर्कशता, शरीर में मांस का क्षय (कुशता), शरीर में कालिमा, शरीर का फूटना, उष्णता की चाह, नींद का न आना, उत्साहहानि और मल का शुष्क होना होता है। पित्त के बढ़ने पर—पीला दिखाई देना, त्वचा पर पीलापन, संताप ( मन की ग्लानि ), शीत वस्तुओं की इच्छा, नींद का कम आना, मूर्छा, शक्तिहास (ओज का नाश), इन्द्रियों में निर्बलता, मल-मूत्र और आँख में पीलापन हो जाना है। कफ के बढ़ने पर—शरीर में, आँखों में श्वेतिमा, शीतलता, अङ्गों में जड़ता, भारीपन, मन-शरीर में ग्लानि, तन्ना, निद्रा, सन्धि दृष्टना होता है ॥ १३ ॥
रसोऽतिवृद्धो हृदयोक्लेदं प्रसेकं चापादयति, रक्तं रक्ताङ्गक्षितां सिरापूरित्वं च, मांसं सिफगण्डोष्ठोपस्थो-रुवाहुजङ्गसु वृद्धिं गुरुगात्रतां च, मेदः सिन्ध्याङ्गतामुदर-पाशर्ववृद्धिं कांसश्वासादीन् दौर्गन्ध्यं च, अस्थ्यध्यस्थीन्य-धिदन्तशरूच, मज्जा सर्वाङ्गनेत्रगौरवं च, शुक्लं शुकाश्मरी-मतिप्रादुर्भावं च ॥ १४ ॥
रस के अति बढ़ने पर—हृत्लास ( मिचली ) प्रसेक ( लालाखाव ) होता है। रक्त के अधिक बढ़ने पर अङ्गों में तथा आँखों में लालिमा, एवं सिरायें (veins) रक्त से भरपूर होती हैं। मांस के बढ़ने पर—नितम्ब, गण्डस्थल, ओष्ठ, जङ्घा, योनि, बाहु, एवं ऊरु में वृद्धि तथा शरीर में भारीपन आ