भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १५ ]

जाता है। मेद के बढ़ने पर—अङ्गों में चिकनापन, उदर एवं पाश्वों में वृद्धि, कास, स्वास, हिकका आदि रोग, और शरीर से दुर्गन्ध आती है। अस्थियों के बढ़ने पर—अधिक अस्थियाँ (चणकास्थियाँ), एवं दाँतों में अधिकता उत्पन्न होती है। मज्जा के बढ़ने पर—सम्पूर्ण अंगों में खासकर आँखों में भारीपन आ जाता है। शुक्र के बढ़ने पर—शुक्राश्रमी एवं शुक्र की अतिप्रवृत्ति होती है ॥ १४ ॥

पुरोषमाटोपं कुक्षौ शूलं च, मूत्रं मूत्रवृद्धिं मुहुर्मुहुः प्रवृत्तिं वस्तितोदमाधमानं च, स्वेदस्त्वचा दौर्गन्धं कण्डूं च ॥ १५ ॥

मल के बढ़ने पर—आधमान, एवं कुक्षि (उदर) में वेदना उत्पन्न होती है। मूत्र के बढ़ने पर मूत्र में वृद्धि (या वृद्धि रोग), बार-बार मूत्रत्याग की प्रवृत्ति, मूत्राशय में पीड़ा एवं अफरा होता है। स्वेद के बढ़ने पर—त्वचा में दुर्गन्धता और खाज होती है ॥ १५ ॥

आर्तवमङ्गमर्दमतिप्रवृत्तिं दौर्गन्धं च, स्तन्यं स्तन-योरपीनत्वं मुहुर्मुहुः प्रवृत्तिं तोदं च, गर्भो जठराभिवृद्धिं स्वेदं च ॥ १६ ॥

आर्तव के बढ़ने पर—अङ्गों का टूटना, रक्त का अधिक आना और उसमें दुर्गन्धि आती है। दूध के अधिक बढ़ने पर—स्तनों में मोटापा, दूध का बार-बार आना और पीड़ा होती है। गर्भ के बढ़ने पर उदर में वृद्धि और पसीना आता है। ('दौर्गन्धं च' के स्थान पर 'दौर्बल्यं च' भी पाठ है) ॥ १६ ॥

तेषां यथास्वं संशोधनं क्षपणं च क्षयाद्विरुद्धेः क्रियाविशेषः प्रकृर्वीत ॥ १७ ॥

इन बड़े हुए दोष, धातु एवं मलों का अपना २ संशोधन (निकालना-निर्हरण), शमन (शान्त करना-घटना) तथा क्षय से अवरुद्ध-अनुकूल (क्षयकारक-घटानेवाले) क्रिया विशेष—चिकित्सा विधानों का प्रयोग करना चाहिये ॥ १७ ॥

पूर्वः पूर्वोऽतिवृद्धत्वाद्धयेद्वि परं परम् ।

तस्मादतिप्रवृद्धानां धातूनां ह्रासतं हितम् ॥ १८ ॥

ये अपने आप बड़े हुए भी अनर्थकारक हैं, और दूसरे धातु के कारण बड़े हुये महान् अनर्थ करनेवाले हैं (रक्त स्वयं बढ़ने पर भी अनर्थकारक है, मांस के कारण रक्त बढ़कर महान् अनर्थ को करता है)। क्योंकि पूर्व (प्रथम) धातु बढ़कर पर (अगले-दूसरे) धातु को बढ़ाता है (रस बढ़कर रक्त को भी बढ़ाता है)। इसी प्रकार पर (दूसरा) धातु बढ़कर पूर्व (प्रथम) धातु को बढ़ाता है (रक्त बढ़कर रस को भी बढ़ाता है)। पर (दूसरा) धातु क्षीण होने पर दूसरे धातु का भी क्षय करता है। इसलिये अति बड़े हुए धातुओं का ह्रास करना हितकारी है ॥ १८ ॥

बल्लक्षणं बल्लक्षयलक्षणं चात ऊर्ध्वमुपदेक्ष्यामः । तत्र रसादीनां शुक्रान्तानां धातूनां यत् परं तेजस्तत् खल्वोजस्तदेव बलमित्युच्यते, स्वशास्त्रसिद्धान्तात् ॥ १९ ॥

इसके आगे बल लक्षणों को तथा बलक्षय के लक्षणों को कहते हैं। रस से लेकर शुक्र तक समस्त धातुओं का जो उत्कृष्ट तेज है, उसी को बल कहते हैं, उसी को ओज कहते हैं—अपने शास्त्र की परिभाषा से यह संज्ञा है।

वि० मन्तव्य—भगवान् धन्वन्तरि कहते हैं कि हे सुश्रुत! हम अपने विचार के अनुसार ओजस् को "बल" कहते हैं। वैसे तो ओजस् द्रव्य है जैसा श्लो० २१--२२ में कहा है। और ओजस् बल (शक्ति) का कारण है और बल ओजस् का कार्य है, परन्तु कभी २ कारण एवं कार्य में अभेद (समानता) मान लिया जाता है और फिर ओजस् तथा बल को बढ़ाने की विधि भी एक ही है, जो २ आहार-विहार ओजस् बढ़ाते हैं वे ही बल को भी ॥ १९ ॥

तत्र बलेन स्थिरोपचितमांसता सर्वचेष्ठास्वप्रतिघातः स्वरवर्णप्रसादो बाह्यानामाभ्यन्तराणां च करणानामात्म-कार्यप्रतिपत्तिर्भवति ॥ २० ॥

सब धातुओं के सारभूत बल के कारण शरीर में स्थिरता मांसवृद्धि, शारीरिक मानसिक सब कार्यों में अप्रतिहत गति, स्वर एवं वर्ण की निर्मलता श्रोत्र, नासिका आदि दशों इन्द्रियों में तथा मन एवं बुद्धि आदि अन्तःशान इन्द्रियों में अपने कार्य का ज्ञान भली प्रकार होता है।

वि० मन्तव्य—बाह्यकरण (बाहरी करण) हस्त पाद आदि कर्मेन्द्रिय और आभ्यन्तर करण (भीतरी करण) श्रोत्र चक्षु आदि शानेन्द्रिय का नाम है, करण अर्थात् इन्द्रिय। करण का अर्थ है 'क्रियते अनेन इति करणम्' किया जाता है जिसके द्वारा वह है "करण"। जिनके द्वारा कर्म किये जाते हैं वे कर्मकरण या कर्मेन्द्रिय तथा जिनके द्वारा शब्दादि विषयों का ज्ञान किया जाता है वे ज्ञानकरण या शानेन्द्रिय कहे जाते हैं। और मनस् के द्वारा सुख दुःख आदि का मनन (मानना) किया जाता है और बुद्धि द्वारा बोध (समझना) किया जाता है, अतः वे भी करण-अन्तःकरण माने जाते हैं ॥ २० ॥

भवन्ति चात्र—

ओजः सोमात्मकं स्निग्धं शुक्लं शीतं स्थिरं सरम् ।

विविकतं मुदु मृस्तनं च प्राणायतनमुत्तमम् ॥ २१ ॥

देहः सावयवस्तेन व्याप्नो भवति देहिनः ।

तदभावाच्च शीर्घन्ते शरीराणि शरीरिणाम् ॥ २२ ॥

कहा भी है—

ओज-सौम्य, स्नेहगुण युक्त, शुक्ल (श्वेत) शीत-वीर्य, शरीरावयवों को स्थिर करनेवाला, प्रसरणशील,