सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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विविक्त ( श्रेष्ठ गुणों से युक्त), मृदु (कोमल) मृत्स्न (पिच्छल) एवं अग्नीप्रोमीय आदि का श्रेष्ठ स्थान है। प्राणियों के सम्पूर्ण शरीरावयव इस ओज ( बल ) से व्याप्त होते हैं। इस ओज के अभाव से प्राणियों के शरीर नष्ट हो जाते हैं ॥ १२१, २२॥
अभिघातात् क्षयात् कोपाच्छोकाद्ध्यानाच्छुमात् लुधः । ओजः संक्षीयते ह्यभ्यो धातुग्रहणनिःसृतम् ।
तेजः समीरितं तस्माद्विघ्नसयति देहिनः ॥ २३॥
ओज का क्षय—अभिघात से, धातुओं के क्षय से, क्रोध से, शोक से, चिन्ता से, श्रम से, भूख के कारण धातुवह क्षोतों से निकला हुआ ओज उपर्युक्त कारणों के कारण क्षीण हो जाता है। वायु के कारण ओज सम्यक् प्रेरित होकर प्राणियों के हृदय स्थान से चलायमान हो जाता है। “परिहार्यां विशेषेण मनसो दुःखहेतवः” ॥ चरक० ॥ २३ ॥
१ ओज शब्द से अभिप्राय अण्डों के अन्तःस्नाव से है। वृषण दो प्रकार का स्नाव उत्पन्न करते हैं। एक बहिःस्नाव और दूसरा अन्तःस्नाव। बहिःस्नाव को शुक्ल कहते हैं और अन्तःस्नाव को ओज कहते हैं। यही स्नाव सम्पूर्ण शरीर में फैला हुआ है। साधारणतः वृषण अन्तःस्नाव को ही उत्पन्न करते हैं। परन्तु स्त्री के सम्पर्क या कामेच्छा के उत्पन्न होने से रक्त में परिवर्तन आ जाता है। शरीर में स्वास-प्रश्वास का वेग बढ़ जाता है। रक्त की गति बढ़ जाती है। स्त्रियों में स्तन हिलने लगते हैं। इस अवस्था में वृषण बहिःस्नाव पैदा करने लगते हैं। अब अन्तःस्नाव बन्द हो जाता है। इस अन्तःस्नाव ओज के दो भाग हैं। एक पर दूसरा अपर। पर-ओज की मात्रा आठ विन्दु हैं और अपर ओज की मात्रा अधा अञ्जलि है। पर ओज में स्रसन या विकार नहीं होता। विकार या क्षय, अपर ओज में ही आता है। इसलिये पर ओज में विकार आने से परिणाम मृत्यु हो है। विस्तार के लिये देखिये चरक० सूत्रस्थान।
चरक में ओज के दस गुण—
गुरु शीतं मृदु रूक्षं वहलं मधुरं स्थिरम् ।
प्रसन्नं पिच्छलं स्निग्धभोजो दशगुणं स्मृतम् ॥
गाय का दूध ओज के समान गुणवाला है, इससे वह बढ़कर है। विष ओज से विपरीत गुणवाला है, इसी से वह मारक है। ओज एक अदृश्य वस्तु है। इसका अनुभव मकरध्वज में से निकलते स्वर्ण एवं शुद्ध स्वर्ण को कसौटी पर रगड़ने से स्वर्ण के ओज के नष्ट होने से कर सकते हैं। मकरध्वज के स्वर्ण से निकली स्वर्ण भस्म, दूसरे स्वर्ण से बनी भस्म को अपेक्षा हीन बीर्य होती है। ओज एक कान्ति है; इसी से वेदमन्त्र में—तेजोऽसि तेजो मयि देहि; ओजोऽसि ओजो मयि देहि यह प्रार्थना है। विस्तार के लिये मेरी भारतीय रसपद्धति देखिये।
तस्य विघ्नसो व्याप्तं क्षय इति त्रयो दोषाः लिङ्गानि भवन्ति सन्धिविश्लेषो गात्राणां सदन् दोषच्यवनं क्रिया-सन्निरोधश्च विघ्नसे, स्तब्धगुरुगात्रता वातशोको वर्णभेदो ग्लानिस्तन्द्वा निद्रा च व्यापन्न, मूच्छूर्वा मांसक्षयो मोहः प्रलापो मरणमिति च क्षये ॥ २४॥
इस ओज के विकृत होने के लक्षण—विघ्नसन ( स्थान से चलायमान होना ), व्याप्त ( अन्यथा रूप होना -विकृत ) एवं क्षय—यह दूषित ओज के लक्षण हैं।
ओज के अपने स्थान से चलायमान होने पर—सन्धियों का विघटन, अङ्गों में पीड़ा, दोषों का स्थानभ्रंश होना, शारीरिक-मानसिक क्रियाओं का निरोध होता है। ओज के व्यापन्न ( दोषों से दूषित होने पर ) अङ्गों में जड़ता, शरीर में भारीपन वातजन्य शोक, गौर आदि वर्णों का बदलना, ग्लानि और निद्रा का आना (आलस्य) होता है। ओज के क्षय होने पर—मूच्छूर्वा, मांस का क्षय, मोह, प्रलाप और मृत्यु होती है।
वि० मन्तव्य—ओजस् की तीन विकृतियाँ होती हैं—१—विघ्नसन—स्वस्थान ( समस्त शरीरावयव ) से विचलित होना—यह “मउजोऽसं वा.....” च० चि० अ० ६ श्लो० ११ के तथा “ओजसा मधुमेहः” चक्रपाणि के अनुसार मधुमेह है अर्थात् मधुमेह में ओजस् मूत्र के साथ वह जाता है, फलतः उक्त लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। २—व्यापद्—स्वस्थानस्थित ओजस् का विकृत हो जाना।
३—क्षय—स्वपरिमाण से ह्रास। चरक के शब्दों में—विभेति दुर्बलोऽभीक्षणं ध्यायति व्यथितेन्द्रियः।
दुर्बल्यो दुर्भन्ता रूक्षः क्षामश्चैवोजसः क्षये ॥ सू० अ० १७॥
अर्थात् ओजस् का क्षय होने पर—डरता है, बार २ दुर्बलता का अनुभव करता है, चिन्ता करता है, इन्द्रियाँ व्यथित-दुर्बल हो जाती हैं, कान्ति नष्ट हो जाती है, मनस् दुःखी रहता है या उसमें बुरी भावना उठती है, शरीर रूक्ष हो जाता है और और क्रुश हो जाता है ॥ २४ ॥
भवन्ति चात्र—
त्रयो दोषा बलस्योक्ता व्यापद्विघ्नसंतक्षयाः ।
विश्लेषसादौ गात्राणां दोषविघ्नसर्ण श्रमः ॥ २५॥
अग्रानुर्य क्रियाणां च बलविघ्नसंलक्षणम् ।
गुरुत्वं स्तब्धताऽङ्गेषु ग्लानिर्वर्णस्य भेदतम् ॥ २६॥
तन्द्वा निद्रा वातशोको बलव्यापदि लक्षणम् ।
मूच्छूर्वा, मांसक्षयो मोहः प्रलापोऽज्जानमेव च ॥ २७॥
पूर्वोक्तानि च लिङ्गानि मरणं च बलक्षये ।
कहा भी है—
ओज के तीन दोष हैं। यथा—व्यापद्, विघ्नसन और क्षय। ओज के विघ्नसन होने पर—शरीर का टूटना, शरीर में