भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 108

६०

मुंश्रुतसंहिता

[ अ० १५ ]

पीड़ा, वातादि की स्थानच्युति, श्रम, क्रियाओं का न होना होता है। ओज के व्यापद् होने पर—शरीर में भारीपन, अङ्गों में जड़ता, ग्लानि वर्ण का बदलना, तन्द्रा, निद्रा, वातजन्य शोफ होता है। ओज के क्षय होने पर—मूर्च्छा, मांस की क्षीणता, मोह, प्रलाप, मूढ़ता एवं पूर्व कहे लक्षण होते हैं ॥ २५-२७ ॥

तत्र विस्वंसे व्यापन्ने च क्रियाविशेषैरिहृद्वैर्वलमाप्याययेत्, इतरं तु मूढसंज्ञं वर्जयेत् ॥ २८ ॥

चिकित्सासूत्र—ओज के विस्वंसन या व्यापन्न होने की अवस्था में रसायन-वाजीकरण आदि क्रियाओं से अग्नि आदि से अवरुद्ध उपचारों से ओज ( बल ) को बढ़ाना चाहिये। क्षीण ओज की—जिसमें संज्ञा नष्ट हो गई हो ऐसे पुरुष को छोड़ दे—क्षीणावस्था में असाध्य है ॥ २८ ॥

दोषधातुमलक्षीणो बलक्षीणोऽपि वा नरः।

स्वयोनिवर्धनं यत्तद्वत्तपानं प्रकाङ्क्षति ॥२९॥

यद्यदाहारजातं तु क्षीणः प्रार्थयते नरः।

तस्य तस्य स लाभे तु तं तं क्षयमपोहति ॥३०॥

यस्य धातुक्षयाद्वायुः संज्ञां कर्म च नाग्रेयेत्।

प्रक्षीणं च बलं यस्य नासौ शक्यश्चिकित्सितुम् ॥३१॥

कहा भी है—

जिस पुरुष के दोष या धातु अथवा मल, या बल क्षीण हो जाते हैं, वह अपने कारण को बढ़ानेवाले खान-पान की चाहना करता है। जिस २ खान पान की चाहना क्षीण पुरुष करता है, उस खान-पान के मिलने से उस पुरुष का क्षय नष्ट

१ इसके आगे प्रथम संस्करण में इतना अधिक था—

आग्नेय तेज भी क्रमशः धातुओं के परिपाक से स्नेह में बदलकर वसा रूप हो जाता है। यह वसा स्त्रियों में विशेष करके होता है। इसलिये स्त्रियों में मूढ़ता, सुकुमारता, कोमलता या थोड़े रोम, उत्साह, आँखों को स्वच्छता, शरीर की बनावट, पांचन शक्ति, कान्ति दीप्ति, आदि गुण होते हैं। यह वसा—कपाय, शीत, तिव्रत, रूक्ष, उपस्थित वेंगों को रोकने से, अतिमैथुन, व्यायाम और रोग-जन्य कृशता से दूषित हो जाती है। इस वसा के भी विस्वंसन ( चलायमान ) होने पर—कठोरता रङ्ग का बदलना, पीड़ा, कान्तिहोना होती है। वसा के दूषित होने पर—कृषता, अग्नि की मन्दता, एवं वसा-नीचे या तिरछी—खिसक जाती है ( शरीर का निचला भाग या पार्श्व भारी हो जाता है )। वसा के क्षय होने पर—दृष्टिहानि, अग्नि-मन्दता, बल का नाश, वायु का प्रकोप या मत्स्य होती है। वसा के क्षय होने पर—स्नेहपान, स्नेह का अम्यग, देह, परिषेक स्निग्ध एवं लघु भोजन देना चाहिये। वसा के विस्वंसन या व्यापद् अवस्था में—रसायन वाजीकरण कर्म करने चाहिये।

हो जाता है। जिस पुरुष में धातुक्षय के कारण वायु कुपित होकर संज्ञा एवं कर्म को नष्ट कर देता है, और जिसका बल क्षीण हो गया है—वह असाध्य है ॥ 'वायोर्धातुक्षयात्कोपो मार्गस्यावरणेन च' ॥ चरक ॥ २६-३१ ॥

रसनिमित्तमेव स्थौल्यं कार्यं च। तत्र श्लेष्ममलाहारसेविनोऽध्यशनशीलस्याणयायामिनो दिवास्वप्नरतस्य चाप एवान्नरसो मधुरतश्च शरीरमनुक्रामन्ततिस्नेहान्मेदो जनयति, तदतिस्थौल्यमापादयति, तमतिस्थूलं लुद्ध्रव्यासपिपासात्तुस्वप्नस्वेदगात्रदौर्गन्ध्यकथनगात्रसादगद्गदत्वाति क्षिप्रमेवाविशन्ति, सौकुमायौन्मेदसः सर्वेक्रियास्वसमर्थः, कफमेदोनिरुद्धमार्गत्वात्चालपव्यायो भवति, आवृतमार्गत्वादेव शेषा धातवो नाप्यायन्तेऽत्यर्थमतोऽरूपप्राणो भवति, प्रमेहपिडकाज्वरभगन्दरविद्रधिवातविकाराणामन्यतमं प्राप्य पञ्चत्वमुपयाति, सर्वं एव चास्य रोगा बलवन्तो भवन्त्यावृतमार्गत्वात् क्षोतसाम्, अतस्तस्योत्पत्तिहेतुं परिहरेत्। उत्पन्ने तु शिलाजतुगुग्गुलुगोमूत्रत्रिफललोहरजोरसाञ्जनमधुयवमुद्गकोरदूषकस्यामाकोद्वालकादीनां विरुक्षणच्छेदनीयानां च द्रव्याणां विधिवदुपयोगो व्यायामो लेखनवस्त्युपयोगश्चेति ॥ ३२ ॥

रस ( आहार रस ) के कारण से स्थूलता, कृशता ( एवं मध्यमावस्था ) होती है। इनमें कफवर्धक आहार करनेवाले, अजीर्णोवस्था में या पूर्व भोजन के न पचने पर भोजन करनेवाले, व्यायाम न करनेवाले, सदा दिन में सोनेवाले पुरुष में धातु अग्निद्वारा परिपाक न होने से आमावस्था में ही तथा अधिक मधुर अन्नरस शरीर में फैलकर अतिस्नेह के कारण मेद को उत्पन्न करता है। यह अतिस्थूलता को उत्पन्न करता है। इस स्थूल पुरुष को लुद्ध्रव्यास, पिपासा, भूख, नींद, पसीना, शरीर में दुर्गन्धता, कथन ( सोते हुए गले में धुधुर ध्वनि-घर्षटि ), अङ्गों में पीड़ा, गद्गद वाक् ( अत्यधिक वचन ) ये रोग शीघ्र ही आक्रान्त कर लेते हैं। मेद की सुकुमारता के कारण सम्पूर्ण क्रियाओं में असमर्थता होती है। कफ एवं मेद द्वारा मार्ग के रुक जाने से अल्पव्याय ( अल्पमैथुन शक्ति ) होती है। कफ एवं मेद से मार्गों के रुक जाने के कारण शेष रक्तादि धातु वृद्धि को प्राप्त नहीं होते। इसलिये स्थूल मनुष्य अल्पप्राण होता है। प्रमेह, प्रमेहपिडिका, ज्वर, भगन्दर, विद्रधि, अथवा वातरोग, इनमें से किसी एक रोग से पीड़ित होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। सब प्रकार के क्षोतों के अवरुद्ध होने के कारण—इस पुरुष में सब रोग बलवान् होते हैं। इसलिये स्थूलता के कारणों का त्याग करना चाहिये।

१ विस्तार के लिये—खान-पान इल्लहण को निबन्धसंबद्ध टीका में देखिये।