भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १६ ]

वैलक्षण्यात्—विषहृशता के कारण (वातादि प्रकृति, रस रक्तादि की मिश्रता-छोटे-बड़े आकार के कारण), अस्थायित्वात् अस्थिरता के कारण (अस्थिरता दो प्रकार की है—नित्यग-आवस्थिक), पुरुषों के दोषधातु एवं मल का पलादि मान नहीं है। इनका तोल नहीं हो सकता। “तत्परं प्रमाणमभिज्ञेयम्”। चरक ॥ ३७ ॥

एषां समस्तं यच्चापि भिषगभिर्बध्दार्थते।

न तत् स्वास्थ्याहते शक्यं वक्तुमन्येन हेतुना ॥३३॥

वैद्यलोग दोष-धातु-मल की जो समता कहते हैं, वह समता-स्वास्थ्य के बिना किसी अन्य कारण द्वारा नहीं कही जा सकती। स्वास्थ्य से ही इनकी समता की परीक्षा होती है ॥३३॥

दोषादीनां त्वसमतामनुमानेन लक्ष्येत।

अप्रसन्नोन्दिश्यं वीक्ष्य पुरुषं कुशलो भिषक् ॥३६॥

दोष-धातु मल इनकी असमानता (क्षय, वृद्धि) को अनुमान द्वारा जानना चाहिये। पुरुष को अप्रसन्न इन्द्रियोवाला देखकर बुद्धिमान् वैद्य अनुमान द्वारा दोषों की असमानता का ज्ञान करे ॥३६॥

स्वस्थस्य रक्षणं कुर्यादस्वस्थस्य तु बुद्धिमान्।

क्षपयेद् बृंहयेच्छचापि दोषधातुमलान् भिषक्।

तावद्यानद्वारोगः स्यादेतत् साम्यस्य लक्षणम् ॥४०॥

स्वस्थ के दोष-धातु-मलों को सदा रक्षा करनी चाहिये। अस्वस्थ के बड़े दोष-धातु-मल का ह्रास करना चाहिये, ह्रास हुए दोष-धातु-मल को बढ़ाना चाहिये। यह कार्य तब तक वैद्य को करना चाहिये—जब तक कि रोग युक्त पुरुष नीरोग हो, यही दोषादि के साम्य लक्षण हैं ॥४०॥

समदोषः समागनिश्च समधातुमलक्रियः।

प्रसन्नान्मोन्दिश्यमानः स्वस्थ इत्यभिधीयते ॥४१॥

स्वस्थ पुरुष का लक्षण—समान दोषवाला, समान (न मन्द, न तीक्ष्ण, न विषमगनि), अगनिवाला समान धातु, समान मलवाला, समान क्रियावाला, प्रसन्न आत्मा इन्द्रिय-मनवाला पुरुष स्वस्थ कहा जाता है।

वि० मन्तव्य—सम शब्द का अर्थ है—उचित परिमाण में सम या स्वाभाविक परिमाणवाला। क्रिया का अर्थ है शरीर के अन्त्र, हृदय, क्रुष्ण एवं यकृत आदि का व्यापार या काम।

इति सुश्रुतसंहितायां स्वस्थाने दोष-धातुमलक्षयवृद्धि-विज्ञानीयो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥

षोडशोऽध्यायः

अथातः कर्णव्यध्वन्यध्वन्यविधिर्मध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

अथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे ‘कर्णव्यध्वन्यध्वन्य विधि’ नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं। जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥

रक्षाभूषणनिमित्तं बालस्य कणौ विध्येते। तौ षष्ठे मासि सप्तमे वा शुक्ले पञ्चे प्रगस्तेषु तिथिकरणमुहूर्त-नक्षत्रेषु कृतमङ्गलस्वस्तिवाचनं धात्र्यङ्के कुमारधराङ्के वा कुमारमुपवेश्य बालक्रीडनकैः प्रलोभ्याभिसान्त्वयन् भिषग्वा महस्तेनाकृष्य कर्णं दैवकृते छिद्र आदित्यकराव-भासिते शनैः शनैर्दक्षिणहस्तेनर्जु विध्येत, प्रतनुर्क सूच्या, बहलमारया, पूर्व दक्षिणं कुमारस्य, वामं कुमार्याः, ततः पिचुवर्ति प्रवेशयेत् ॥३॥

बालक के कानों को दो कारणों से बींधा जाता है। एक-रक्षा के कारण (वृद्धिरोग से रक्षा करने के उद्देश्य से१)), और दूसरा-आभूषण पहिनाने के उद्देश्य से। कान का बींधना—छठे या सातवें महीने में—शुक्लपक्ष में—प्रशस्त-तिथि प्रशस्त कर्ण एवं प्रशस्त मुहूर्त तथा नक्षत्रों में—मंगल—स्वस्तिवाचन करके, कुमार को परिचारिका की गोद में या कुमार को रखनेवाली की गोद में बिठाकर-खिलौने से प्रलोभित करके—पुचकारते हुए—वैद्य वामहस्त से कान को खींचकर-सूर्यकिरणों से प्रकाशित स्वाभाविक छिद्र में (जहाँ पर बसा कम होती है) दक्षिण हाथ से धीरे धीरे सीधा छेद करे। बींधते समय सूर्य को सीधा चलाना चाहिये। पतले कान को सूर्य से बींधना चाहिये—मोटे कान को आर से (जिससे कि चमारा सीते हैं) बींधे। कुमार का प्रथम दक्षिण कर्ण बींधना चाहिये, पीछे वाम, कुमारिका का प्रथम वाम, फिर दक्षिण कर्ण बींधना चाहिये। बींधने के पश्चात् कान में पिचुवर्ति (कपड़े की नरम बत्ती) लगा देनी चाहिये।

वि० मन्तव्य—रक्षाभूषण निमित्तं……अर्थात् बालग्रहों से रक्षा के लिये। दैवकृत छिद्र कान की पेपड़ी को तानने पर जहाँ से सूर्य की धूप का सा उजाला दिखाई पड़े-प्रतीत हो वह दैवकृत छिद्र

१ आत्र उत्तरने पर वा अण्डकोषों के विकारों (ब्रन्धन) में अब भी कान को बींधने को प्रथा है। इससे आराम होता है। आत्र स्वयं भी कहेंगे—

“व्यत्यासाद् वा शिरों विध्येत् आत्रवृद्धिनिवृत्तये”। सुश्रुत।

(२) कुमारतन्त्र में— कर्णव्यध्वे कृते बालो त-ग्रहैरभिभूयते। भूष्यतेऽस्य मुखं तस्मात् कार्यस्तत् कर्णव्योधः ॥ यद्यपि कर्णव्यध्वे ब्रणिनि काले रक्षोभयं भवति, तथाऽपि तदल्पकालं प्रतिकर्तव्यं च ॥ तेन चिरकालरसायै तदल्पं व्यजत एव। भानुमती।