सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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माना जाता है और वहाँ वेध किया जाता है । इस प्रदेश में वेध होने पर रक्त नहीं निकलता अथवा बहुत थोड़ा निकलता है ।
शोणितबहुत्वेन वेदनया चान्यदेशविद्वमिति जानीयात्, निरुपद्रवतया तद्देशविद्वमिति ॥४॥
यदि रक्त अधिक आये एवं वेदना बहुत हो तो समझना चाहिये कि दैवकृत छिद्र में छेद नहीं हुआ । और यदि किसी प्रकार का उपद्रव न हो तो समझना चाहिये स्वाभाविक छेद में विधा है ॥४॥
तत्राज्ञेन यदक्षया विद्व्वासु सिरासु कालिकासर्परिकालोहितिकासूपद्रवा भवन्ति । तत्र, कालिकायां ज्वरो दाहः श्वयशुर्वेदना च भवति, सर्परिकायां वेदना ज्वरो ग्रन्थयश्च, लोहितिकायां मन्यास्तम्भापतानकशिरोग्रहकर्णशूलानि भवन्ति । तेषु यथास्वं प्रतिकुर्वीत ॥५॥
कर्णवेध कर्म में—अनजान वेधक द्वारा अथवा दैवयोग से—कालिका सर्परिका अथवा लोहितिका संज्ञक सिराओं में वेध हो जाता है तो उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं या हो सकते हैं, यथा—कालिका सिरा का वेध हो जाने पर ज्वर, दाह, शोथ और वेदना होती है, सर्परिका का वेध होने पर—वेदना, ज्वर तथा सिराग्रन्थियाँ होती हैं और लोहितिका का वेध होने पर—मन्यास्तम्भ, अपतानक, शिरोग्रह, तथा कर्णशूल आदि हो जाते हैं । इन उपद्रवों में यथोचित उपचार करे ।
सिराओं की उक्त संज्ञा सम्भवतः—कौमार भृत्य के अनुसार है । वर्त्तमान चरक सुश्रुत में अन्यत्र इनकी चर्चा नहीं है । केवल अष्टाङ्गहृदय उत्तर अ० १ में—कालिका, सर्परी तथा रक्ता नाम देकर चर्चा की गई है । इस अध्याय में कर्ण-वेध की विधि अधिक स्पष्ट है । पाठक देखें ॥५॥
क्लिष्टजिह्वाप्रस्तसूचीवृषाद्वा गाढतरवर्तिःवाद्योषसुदायाद्प्रशस्तवृषाद्वा यत्र संरम्भो वेदना वा भवति तत्र वर्त्तिसुपहृत्यासु सधुक्केरण्डमूलमञ्जिष्टायवतिलकत्कैर्मधुघृतप्रगढेरा लेपयेत्तावद्यावत् सुरुढ इति, सुरुढं चैन पुनर्विध्येत्, विधानं तु पूर्वोक्तमेव ॥६॥
क्लिष्ट ( अमनोज-खुरदरी ), जिह्वा ( टेड़ी ), अप्रशस्त ( गुणहीन ) सूई से बीघने के कारण या अधिक मोटी बत्ती से अथवा दोष प्रकोप से या दैवकृत छिद्र में न विधने से—जहाँ पर संज्ञन या वेदना हो तो बत्ती को निकालकर—मधुक ( मुलहडी ), एरण्डमूल, मजीठ, जो और तिल, इनके कल्क को मधु एवं घी में मिलाकर गाढ़ा लेप कर देना चाहिये । यह लेप तब तक बरतना चाहिये जब तक कि भली प्रकार भर न जाये । भली प्रकार रोहण होने पर फिर इसको बीघना चाहिये । बीघने की विधि पूर्व की भाँति है ॥६॥
तत्र सम्यग्विद्वमासतैलेन परिषेचयेत्, ज्यह्यात्स्यह्याव वर्त्तिसूलतरां दद्यात्, परिषेकं च तमेव ॥७॥
भली प्रकार से दैवकृत छिद्र में विधने पर—अपक्व तेल ( तिलों को पीसकर निकाला तेल ) द्वारा परिषेचन करना चाहिये । प्रत्येक तीसरे दिन बत्ती अधिक मोटी कर देनी चाहिये । बत्ती का आमतैल से परिषेक करते रहना चाहिये ॥७॥
अथ व्यपगतदोषोपद्रवे कर्णे वर्धनार्थं लघु वर्धनकं कुर्यात् ॥८॥
दोष एवं उपद्रवों के शान्त होने पर कानों के छिद्रों को लम्बा करने के लिये ( सौन्दर्य दृष्टि से ) 'लघुवर्धनक' ( दोष विशेष के कारण—अपामार्ग, नीम, कपास आदि लकड़ियों से या सीसक आदि धातुओं से बने—हल्के-छोटे छल्ले बालियाँ ) पहिनाने चाहिये । ( मार के कारण कान नीचे लटकने लगते हैं ) ॥८॥
एवं विवर्धितः कर्णद्विष्यते तु द्विधा नृणाम् । दोषतो वाऽभिधाताद्वा सन्धानं तस्य मे शृणु ॥९॥
इस प्रकार से बढ़ाए हुए पुरुषों के कान, वातादि दोषों से उत्पन्न रोगों से या गिरने आदि से चोट लगने पर—फटकर दो भाग हो जाते हैं । इनको जोड़ने की विधि मुझ से सुनो ॥९॥
तत्र समासेन पञ्चदशकर्णबन्धाकृतयः । तद्यथा—नेमिसन्धानक उत्पलमेघक वल्लूरक आसङ्गिमो गण्डकर्ण आहार्यो निर्वेधिमो व्यायोजिमः कपाटसन्धिकोऽर्धकपाटसन्धिकः संक्षिमो हीनकर्णो वल्लीकर्णो यष्टि-कर्णः काकोष्ठक इति । तेषु, पृथुलायतसमोभयपालिन्मिसन्धानकः, वृत्तायतसमोभयपालिन्तल्लूरकः, हस्तवृत्तसमोभयपालिन्वल्लूरकः, अभ्यन्तरदीर्घकपालिरासङ्गिमः, बाह्यदीर्घकपालिर्गण्डकर्णः, अपालिन्भयतोऽप्याहार्यः, पीठोपमपालिन्भयतः क्षीणपुत्रिकाश्रितो निर्वेधिमः, स्थूलाणुसमविषमपालिन्योयोजिमः, अभ्यन्तरदीर्घकपालिरितराल्पपालिः कपाटसन्धिकः, बाह्यदीर्घकपालिरितराल्पपालिर्धकपाटसन्धिकः । तत्र दशैते कर्णबन्धविकल्पाः साध्याः, तेषां स्वनामभिरैवाकृतयः प्रायेण व्याख्याताः । संक्षिमाद्यः पञ्चासाध्याः तत्र शुष्कशष्कुलिहस्तन्त्रपालिरितराल्पपालिः संक्षिप्तः, अन्विष्टानपालिः पर्यन्तयोः क्षीणमांसो हीनकर्णः, तनुविषमाल्पपालिर्वल्लीकर्णः प्रथितमांसस्तब्धसिराततसूदमपालियष्टि-कर्णः, निर्सांससंक्षिमात्राल्पशोणितपालिः काकोष्ठक इति । बद्धेष्वपि तु ओफ्दाहरागपाकपिडकासावयुक्ता न सिद्धिसुपथान्ति ॥१०॥
संक्षेप से कर्णबन्धाकृतियाँ पन्द्रह हैं । यथा—नेमिसन्धानक, उत्पलमेघक, वल्लूरक, आसंगिम, गण्डकर्ण, आहार्य, निर्वेधिम, व्यायोजिम, कपाटसन्धिक, अर्धकपाटसन्धिक, संक्षिम, हीनकर्ण,