सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुश्रुतसंहिता
[ अ० १४ ]
वल्लीकर्ण, यष्टिकर्ण और काकोष्ठक। इनमें—जो पालि (कर्णपालि)—पुथुल (विस्तीर्ण), आयात (दीर्घ), सम (तुल्य)—परस्पर होती हैं—वहाँ नेमिसन्धानक बन्ध बरतें। जिसकी दोनों पाली गोल, दीर्घ और समान हो—उसको उत्पल्लमेयक बंधवावें। जिसकी दोनों कर्णपालियाँ छोटी, गोल, एवं परस्पर समान हों वहाँ वल्लूरक बंध बरतें। जिसकी एक कर्णपाली अन्दर एवं लम्बी हो वहाँ आसंगिम बन्ध बरतें। जिनकी एक पाली बाहर एवं लम्बी हो वहाँ मण्डकर्ण बन्ध, दोनों पाली न हों (या अल्प हो) वहाँ आहार्य; जिसकी पालि मूल से ही लिंग्न हो—सपाट हो, कर्णपुत्रिका के ऊपर आश्रित हो, वहाँ निर्वेधिम; जिसकी एक पाली का भाग स्थूल हो, दूसरी छोटी हो, एक समान और दूसरी विषम हो, वहाँ ग्यायोजिम; जिसकी एक पाली अन्दर—लम्बी हो और दूसरी पाली अल्प हो, वहाँ कपाटसन्धिक बाँध। जिसकी पाली का बाहर का भाग लम्बा हो और दूसरा अल्प हो वहाँ अर्धकपाटसन्धिक बन्ध प्रयोग करना चाहिये। ये दस कर्णबन्ध के भेद साध्य हैं। प्रायः इनकी आकृतियाँ इनके अपने नामों से ही स्पष्ट हैं। संक्षिप्त आदि पाँच बन्धन असाध्य हैं। तथापि इनमें बाह्य पाली का अधिष्ठान (शष्कुली) शुष्क हो तथा दूसरी कर्णपाली छोटी हो तो संक्षिप्त बन्ध करना चाहिये। जिसमें पाली का अधिष्ठान न हो और मण्ड के बाह्य पार्श्व में मांस क्षीण हो तो हीनकर्ण बन्ध बरतना चाहिये। पतली, विषम अल्पपाली में वल्लीकर्ण; अथित मांस स्तम्भ सिरायुक्त सूक्ष्म पालि में यष्टिकर्ण बरतना चाहिये। मांस रहित, रक्त की कमीवाली संक्षिप्त पालि में काकोष्ठक बन्ध बरतना चाहिये। कर्णबन्धन में शोक, दाह, रोग, पाक, पिडिका एवं स्नायु होने से—चिकित्सा करने पर भी असाध्य रहते हैं ॥१०॥
संवन्ति चात्र—
यस्य पालिद्वयमपि कर्णस्य न भवेदिति।
कर्णपीठं समे मध्ये तस्य विद्ववा विवर्धयेत् ॥११॥ कहा भी है—
जिस पुरुष के कानों में दोनों पालि न हों उसके कर्णपीठ को मध्य में बाँधकर बढ़ाना चाहिये। (कर्णपुत्रिका—Tragus, Anti Tragus) ॥११॥
बाह्यायामिह दीर्घायां सन्धिराभ्यन्तरो भवेत्।
आभ्यन्तरायां दीर्घायां बाह्यसन्धिरुदाहृतः ॥१२॥
जिस पुरुष की वाम पाली लम्बी हो, उसकी आभ्यन्तर पाली में सन्धि करनी चाहिये। इस प्रकार प्रथम कपाटसन्धिक, दूसरा—अर्धकपाट-सन्धिक बन्धन होता है ॥१२॥
एकैव तु भवेत् पालिः स्थूला पृथ्वी स्थिरा च या ।
तां द्विधा पाटयित्वा तु छिन्त्वा चोपरि सन्धयेत् ॥१३॥
यदि एक ही मोटी, लम्बी और हृद पाली हो (दूसरी पाली न हो) तो इसको बीच से दो भाग करके दूसरी तरफ जोड़ देना चाहिये ॥१३॥
गण्डादुत्पाट्य मांसेन सानुबन्धेन जीवता ।
कर्णपालीमपालेस्तु कुयीन्तिलिख्यशास्त्रवित् ॥१४॥
गण्ड प्रदेश में संलग्न जीवित मांस को गण्ड प्रदेश से उखाड़कर—पाली रहित पुरुष में—शास्त्रवित् वैद्य कर्णपाली को बनाये (Rexo Plastic Operation) ॥१४॥
अतोऽन्यतमं बन्धं चिकीर्षुरमोपहरणीयोक्तोपसंभूतसंभारं विशेषतश्चात्रोपहरेत् सुरामण्डं क्षीरमुदकं धान्याम्लं कपालचूर्णं चेति । ततोऽङ्गनां पुरुषं वा प्रथितकेशान्तं लघु मुक्तबन्तमामैः सुपरिगृहीतं च कृत्वा, बधमुपधार्य, छेद्यभेद्यलेख्यव्यवधानैरुपपन्नेरुपपात्र, कर्णशोणितमवेदय दुष्टमदुष्टं चेति । तत्र वातदुष्टे धान्याम्लोष्णोदकाभ्यां पिप्तदुष्टे शीतोदकपयोभ्यां श्लेष्मदुष्टे सुरामण्डोष्णोदकाभ्यां प्रक्षाल्य कर्णौ, पुनरवल्लिख्यानुन्ततमहीनमविषं च कर्णसन्धि सन्निवेश्य, स्थितरक्तं संदध्यात् । ततो मधुघृतेनाभ्यञ्ज्य, पिचुप्रोतयोरन्यतरेणावगुण्ठ्य, सूत्रेणानवगाढमनतिगिथिलं च बद्ध्वा, कपालचूर्णनावकीर्थाचारिकमुपदिशेत्, द्विगणीयोक्तं च विधानेनोपचरेत् ॥१५॥
इन उपरोक्त बन्धनों में से किसी एक बन्धन को करने की इच्छा से 'अग्नीपहरणीय' अध्याय में वर्णित आवश्यक वस्तुसमूहों को, खासकर इस कार्य में सुरा, मण्ड दूध, पानी धान्याम्ल और कपालचूर्ण (घड़े के ठीकरे का या शिर की अस्थियों की मस्म—दोनों ही उपयुक्त हैं) को एकत्रित करना चाहिये। इसके अनन्तर स्त्री अथवा पुरुष—दोनों के बालों को पीछे बाँधकर, थोड़ा सा लघु हल्का भोजन कराके, विश्वस्त पुरुषों द्वारा पकड़वाकर बन्धन का निश्चय कर छेद्य, भेद्य, लेख्य, व्यधनकार्यों को करके—कान के दूषित या अदूषित रक्त की परीक्षा करके—कानों का फिर एक बार अवलेखन करके कर्णसन्धि को न ऊँचे, न नीचे और न विषम रखकर—रक्त निकलना बन्द होने पर जोड़ देना चाहिये। वात से दूषित रक्त में—धान्याम्ल एवं उष्णोदक से, पिप्त से दूषित रक्त में—शीतोदक एवं दूध से; कफ से दूषित रक्त में—सुरा-मण्ड एवं उष्णोदक से घोना चाहिये। सन्धि करने के अनन्तर मधु एवं घी लगाकर रुई या कपड़े—किसी एक से द्वापकर—घाई (पट्टी से) से—न तो बहुत कसकर न बहुत ढीला बाँध देना चाहिये। ऊपर से कपाल चूर्ण छिड़क देना चाहिये। इसके अनन्तर—आहार-विहार को समझा देना चाहिये। और द्विगणीय अध्याय में कहे गये आलेपादि बरतने चाहिये ॥१५॥