सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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भवति चात्र—
विषद्वयं दिवास्वप्नं व्यायाममतिभोजनम् ।
व्यायाममग्निसंतापं वाक्यश्रमं च विवर्जयेत् ॥ १६ ॥
कहा भी है—
विषद्वय ( विषद्वय—रगड़ना हिलाना—डुलाना ), दिन में सोना, व्यायाम, अतिभोजन, मैथुन, आग का सेकना, बोलना, ये कार्य परित्याग कर देने चाहिये ॥ १६ ॥
न चासुद्धरक्तमतिप्रवृत्तरक्तं क्षीणरक्तं वा संदध्यात् । स हि वातदुष्टे रक्ते रुद्धोऽपि परिपुटनवान् , पित्तदुष्टे दाहपाकरागवेदनावान् , रल्लेखमदुष्टे स्तब्धः कण्डूमान् , अतिप्रवृत्तरक्ते श्यावशोफवान् , क्षीणोऽल्पमांसो न वृद्धि- मुपैति ॥ १७ ॥
असुद्धरक्त, अधिक रक्तस्त्राव होने पर, रक्त के न निकलने पर—सन्धान नहीं करना चाहिये । क्योंकि वात से दूषित रक्त की अवस्था में पड़ी बाँधने पर—परिपोट रोग होता है । पित्त से दूषित रक्त की अवस्था में—दाह, पाक, लालिमा एवं वेदना होती है । कफ से दूषित रक्त की अवस्था में—जड़ता एवं कण्डू होती है । रक्त के अधिक खतित होने पर सन्धान करने से क्रुण्णता और सूजन होती है । रक्त के क्षीण होने पर सन्धि करने से—अल्प मांस—पुनः वृद्धि को प्राप्ति नहीं होता ॥ १७ ॥
(आमतैलेन त्रिरात्रं परिषेचयेत् , त्रिरात्राच्च पिचुं परिवर्तयेत् ।) स यदा सुरुद्धो निरुपद्रवः सवर्णा भवति तदैतं शनैः शनैरभिवर्धयेत् । अतोऽन्यथा संरम्भदाहपाकरागवेदनावान् , पुनरिलक्षते वा ॥ १८ ॥
आमतैल द्वारा तीन दिन तक परिषेचन करना चाहिये । एवं प्रत्येक तीसरे दिन पिचुं बदलते रहना चाहिये । जिस समय व्रण भली प्रकार भर जाये, किसी प्रकार का उपद्रव न रहे, त्वचा के समान व्रण का रंग आ जाये, तब फिर इस कर्ण को धीरे २ बढ़ाना चाहिये । इसके विपरीत करने से दाह, पाक, लालिमा, वेदना होती है, अथवा फिर फट जाता है ॥ १८ ॥
अथास्याप्रदुष्टस्याभिवर्धनार्थसम्भ्यङ्गः । तद्यथा—गो- धामृतुदविकिरान्नपौदकवसामज्जानो पयः सपिस्तैलं गौर- सर्पपजं च यथालाम् संभूत्वाकीर्लकबलातिबलानन्तापा- मार्गाश्वगन्धाविदाशिगन्धाक्षीरशुक्लजलशूकमधुरवर्गपय- स्याप्रतिवापं तैलं वा पाचयित्वा स्वतनुगुप्तं निदध्यात् १९
१ कविराज हाराणचन्द्र जी इसको पद्य में लिखते हैं । यथा— “आमतैलपरिषेकं त्रिरात्रमत्रचारयेत् । ततस्तैलेन संसृष्टं व्यहादपनयेत् पिचुम् ॥” यह पाठ—“विषद्वयं दिवास्वप्नं—इस श्लोक के साथ दिया है।
अदूषित कान को बढ़ाने के लिये अभ्यङ्ग कहते हैं । यथा— गोधा, प्रतुद ( बटेर आदि ), विष्किर ( कुम्कुद आदि ), आनू ( वराह, महिषादि ), औदक ( रोहित-मत्स्यादि ), इनकी बसा एवं मज्जा को दूध, घी और श्वेत सरसों का तैल— इनमें से जितनी वस्तुयें मिल सकें उनको लेकर आक, श्वेत फूल का आक, बला, अतिबला, सारिवा, अपामार्ग, असगन्ध, शालपर्णी, क्षीरविदारी, जलशूक—शैवाल, रसविशेष विज्ञानोय अध्याय में कहे मधुरवर्ग, पयस्या ( क्षीरविदारी ), इनके निक्षेप से तैल पकाकर गुप्तस्थान में रख देना चाहिये ॥ १९ ॥
स्वेदितोन्मदिर्तं कर्णं स्नेहेनैतैन योजयेत् ।
अथासुपद्रवः सम्यग्वलवांश्च विवर्धते ॥ २० ॥
कान को प्रथम स्वेदन देकर फिर इस तैल के साथ मर्दन करना चाहिये । इस प्रकार करने से कान उपद्रव रहित होकर बढ़ता है, एवं बलवान् होता है ॥ २० ॥
यवाश्वगन्धायष्ट्याह्वितैस्तैलैश्चोद्भूतं हितम् ।
उद्बर्त्तन—जौ, असगन्ध, मुलहडी और तिल इनके द्वारा कान का उद्बर्त्तन, करना हितकारी है ।
शतावर्षश्वगन्धाभ्यां पयस्यैरष्टजीवनैः ॥ २१ ॥
तैलं विपक्वं सक्षीरसम्भ्यङ्गात् पालिवर्धनम् ।
शतावरी, असगन्ध, क्षीरकाकोली, एरण्ड, जीवक ( या काकोल्यादि द्रव्य ), इनके कल्क से (स्नेह का चतुर्थांश कल्क), केवल क्षीर में तैलपाक करना चाहिये । इस तैल के अभ्यंग से कर्णपालि बढ़ती है ॥ २१ ॥
ये तु कर्णा न वर्धन्ते स्वेदस्नेहोपपादिताः ॥ २२ ॥
तेषामपाङ्गदेशे तु कुर्यात् प्रच्छानमेव तु ।
बाह्यच्छेदं न कुर्यात् व्यापदः स्युस्ततो ध्रुवाः ॥ २३ ॥
इस उपरोक्त विधि से जो कान नहीं बढ़ते, उनके लिये अपांग देश में प्रच्छान करना चाहिये (अपांग देश कर्ण पुत्रिका का अधःप्रदेश) इस प्रदेश में थोड़ा-सा छेदन करना चाहिये । अधिक छेदन करने पर (सिरामर्म नामक दो मर्म हैं)—आन्ध्य, दृष्टि का नाश होता है । बाह्यच्छेद—कर्णबाह्य—लतिका का छेदन (त्वचामात्र) करने पर कर्णलतिका का फटना रोग उत्पन्न होते हैं ॥ २२-२३ ॥
वद्धमात्रं तु यः कर्णं सहसैवाभिवर्धयेत् ।
आमकोशी समाधमातः क्षिप्रमेव विमुच्यते ॥ २४ ॥
१ वात्स्यायन कामसूत्र में भी कर्णपालि एवं स्तन तथा लिंग को बढ़ाने के लिये प्रयोग दिये हैं । उनमें जलशूक का अर्थ ‘घोषा’ है । इसके शरीर पर बाल होते हैं । इनके उपयोग से शूकरोग भी होता है । देखिये माधवनिदान और मधुकोप टीका ।
तैलपाचन उसी क्रम से करना चाहिये—जिस क्रम से विधान—यथा—कल्क, स्नेह से चतुर्थांश क्षीर—चतुर्गुण तैल से (द्वान्तरानुवृत्ते क्षीरमेव चतुर्गुणम्, कल्कस्तु स्नेहपादिकः) ॥