सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६& सुश्रतसंहिता
जो मनुष्य बद्ध मात्र कान को ( जो कान अमी थोड़ा दी
जुड़ा है ) एकदम से--सहसा ही बद्ता है, वह भर प्रकार ख
सध्य म से रोहण न होने के कारण शीघ्र ही ध्रथग् हो जाता ई ॥
जातरोमा सुबरमौ च स्छष्टसन्धिः समः स्थिरः ।
सुरूढोऽवेधनो यश्च तं कण वधयेच्छनः ॥ २५ ॥
जिस कान पर बाल उन्न हो गवे हों, शोभन दिद्रबाछा
संलग्न सन्धि, तिम्नो्नत रहित, समान, इद् भटी प्रकार रोहण
हआ, वेदना रदित, जो कान ही; उसको धीरे २ बद़ाना
चाहिये ॥ २५॥ अमिताः कर्णबन्धास्तु विज्ञेयाः कुशकरिह ।
यो यथा सविशिष्टः स्यात्तं तथा वि नियोजयेत् ॥ २६।
कुशलो को ध्यान रखना चाहिये कि कणवबन्धन अरस्ख्य
ह । जो बन्धन जिस स्थान पर ठीक तरह से बेठे--उसको
उसी स्थान पर गाना चादिये ॥ २६ ॥
( कणेपाल्यामयाननुणां पुनवदयामि सुश्रुत ¦ ।
कणेपाल्यां प्रकुपिता वातपित्तकफाखयः ॥ १॥।
द्विधा वाऽप्यथ संसष्टाः करन्ति विविधा रुजः ।
विस्फोटः स्तन्धता ओफः पास्यां दोषे तु वातिके ॥२॥
दाहविस्फोटजननं जञोफः पाकश्च पेत्तिके ।
कण्डूः सश्वयथुः स्तम्भो गुरुसं च कणष्ठास्मकं ॥ ३ ॥
यथादोषं च संशोध्य कुयोत्तेषां चिकित्सितम् ।
स्वेदाभ्यङ्गपरीषेकेः प्रङेपासग्विमोक्षणेः ॥ ४॥
मद्टी क्रियां इंहणीयेयथास्वं भोजनस्तथा । `
य एवं वेत्ति दोषाणां चिकित्सां कतुमहंति ॥ ५॥
( हे सुश्रत ! मनुष्यों की कणपाङि के रोगों को फिरसे
चि० अ० २१ मेँ कर्हगा } ` वात, पित्त, कफ तीनों दोष, एवं
संसष्ट दोषों से तथा तीनों दोषों के मिलने से (सातप्रकार के)
नानां प्रकार के रोग उन्न होते ह । बातजन्य पाठिदोष मे--
विस्फोट जडता एवं सूजन होती दै 1 पित्तजन्य पालिदोष मे--
जलन, विस्फोट ओर सूजन होती हे 1 कफजन्य पाङ्दिष मँ--
कृण्ड , सूजन (८ आद्र ), स्तम्भ ओर भारीपन होतो है । दोघ
के अनुखार इनका संशोधन करके ` चिकित्सा करनी चादिये ||
` अतङध्वर नामलिङ्गवच्ये पाल्यामुपद्रवान्।
उत्पाटकश्चोत्युटकः श्यावः कण्डूयुतो शरखम् ॥ & ॥
~ - -अवमन्थः सकण्ड्को अ्रन्थिको जम्बुरस्तथा ।
. खावी च दाहवश्िव -खण्वेषां क मः च्याम् ॥ ७ ॥ `
इसके आगे पाटी के उपद्रवं का नाम एवं ठक्षण कहते ` ई--उत्पायक, उ्युटक--इनमे खाज बहत होती है, ओर इसका रङ्ग कालहा होता है । अवमन्थ मं खाज होती दै। ग्रन्थिक एवं जम्बूल--मे छाव ओर दाह । इनकी चिक्त्छा क्रम |
से कहते अ च । सिद्ध तठ को प्रयोग करना उत्तम है । ब्रंह्ण कायं म
इनकी छाठ, इनका लेप करना चाद्ये | ओर इनके कल्क
दूध मे पकाया तेर प्रयोग करना चाहिये । उस्पुरक रोग गे
शम्पाक, अमल्ताख, सहजन, पएतीक ( नाट करञ्ज ), गोषा ।
की मेद्, गोधा को वसा ( सांस स्नेह ) सुअर का पित्त,गाय ,
का पित्त ओर काली हरिणी का पित्त इनको धीम मिराकर् ठे ।
करना चाहिये ओर इने ही संस्कृत तेल प्रयोग करना चाहिये। .
. ^ --ड्खिस्वा तत्खवं घृष्ठां चूणखाधस्य जम्बु ।
| श्यामा ( निसो ), अनन्तमूल ओर चाल की-कणि्या;-ई
रोग मे-पाा, रसौतः शदद; कुस्थी आदि उष्णएवीयं आध, ।
सं बनायी उष्ण काजी, इनका च्य तथाः इनसे. रस्त ० प्रयोग करना चाहिये । कण्डयुक्त यदि बण हौ तो निम्ब ९4
४ [ २,
अपामा; सजेरसः पाटखालकुचतस्वचोौ |`
उत्पारके प्रखेपः स्यात्तेखमेभिश्च पाचयेत् ॥ ८ ॥
उम्पाकशिग्रपतीकान् गोधामेकोऽथ तद्रसम् ।
वाराहं गव्यसैणेयं पित्तं सर्पिश्च संसृजेत् ॥ < ॥
ठेपसुरपुटके दद्यात्तेखमेमिश्च साधितम् ।
उत्पारक रोग मै--अपामाग, राक, पाटला ओर बडहर
गोरं सुगन्धां सश्याभासनन्तां तण्डुरीयकम् । १०॥
रयाव प्ररेपनं ददयात्तेखमेभिश्च साधितम् |
पाठां रसाञ्जनं क्ष्रं तथा स्यादुष्णका ञ्जिकम ॥११॥
द्दयाल्खेपं सकण्डूके तैलमेभिश्च साधितम् । .
ब्रणमूतस्य देयं स्यादिदं तटं विजानता ॥ (२॥ ` |
मधुक्चीरकाकोीजीवकायेर्विपाचितम् । . -‡ |
गोधावराहसपीणां बसाः स्युः कृतच्रहणे ॥ ६३ ॥. ` ।
` प्रटेपनमिदं दद्यादवसिच्यावमन्थके । ॥
प्रपौण्डरीकं मधुकं समङ्गां धवमेव च ॥.१४॥
तेरमेभिश्च संपक्तं श्णु कण्डुमतः क्रियाम् ।
सहदेवा विङबदेवा अजाक्षीरं ससेन्धवम्। ~:
एतेरखेपनं दयात्तेखमेमिश्च साधितम् ॥ १५॥. ~
ˆ मन्थिके कुटिकां पब खावयेद्वपाव्यतु। .
“ ततः सैर्धवचूणं च धृष्टा खेपं प्रदापयेत् ॥ ९६ ॥ ~“
, : क्षीरेण प्रतिखा्यनं शद्धं संरोपयेत्ततः ॥ .१७॥
` --मधघुपणीं मधूकं, च सधुक मधुना सह । ४.
; छेषः खाविणि दातम्यस्तेर्मेभिश्च साधितम् ॥ .॥ .
. पद्वत्केः.समधुकेः-पिष्टेस्तेच घृतान्वितेः1 ।
. -जीवकायेः ससर्पिच्केदंद्यमानं प्र्पयेत्॥ १९.॥ ५ | {~ श्याव रोग. म--गौरी ( दल्दी ); सुगन्धा .( रसला |
टेप तथा इनसे साधित तेर का प्योग्-करना तरादियेः। कण्डं
ए श
प्रयोग करना चाहिये । सुच्हदी, क्षीरकाकोली, -जीवकगंण 8