भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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मुश्रतसंहिता

[ अ० १७ ]

उनके नाम—नरथू, नाथू, नथमल्ल तथा नरथासिंह आदि रख दिये जाते हैं ॥३२॥

इति श्रीमुश्रतसंहितायां सूत्रस्थाने कर्णव्यधवन्य- विधिर्नाम षोडशोऽध्यायः ॥१६॥

सप्तदशोऽध्यायः

अथात आमपक्वैषणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

इसके आगे आमपक्वैषणीय (पच्यमान और पक्व) अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने मुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥

शोफसमुत्थाना ग्रन्थिविद्रध्यलजीप्रभृतयः प्रायेण व्याधयोऽभिहिता अनेकाकृतयः, तैर्विलक्षणः पृथुग्रंथितः समो विषमो वा त्वङ्मांसस्थायी दोषसंघातः शरीरैक- दोशोत्थितः शोफ इत्युच्यते ॥ ३ ॥

ग्रन्थि, विद्रधि, अलजी आदि कई (गलगण्ड, अर्बुद, रलीपद आदि २) व्याधियाँ इस ग्रन्थ में पृथक् पृथक् अध्यायों-प्रकरणों में कहीं गई हैं, जिनका समुत्थान-कारण शोफ होता है परन्तु उन सबसे पृथक् शरीर के किसी भी एक देश में उत्पन्न दोषसंघात (दोषसञ्चय), "शोफ"—ब्रण शोफ (फोड़ा) कहलाता है। वह विविध लक्षणोंवाला, कोई चौड़ा (चकलीदार) कोई ग्रंथित (गॉट का सा), कोई सम (गोल) तो कोई विषम (कोनोवाला) और केवल त्वचा एवं मांस में अभ्रित होता है। यह ब्रणशोफ या फोड़ा कहलाता है। ब्रणशोफ का अर्थ है 'ब्रणाय शोफः' अर्थात् ब्रण के लिये—घाव होने के लिये जो शोफ होता है वह ब्रणशोफ कहलाता है। पाठक विचार करें कि ग्रंथि आदि से इसमें क्रिया विलक्षणता—मेद है ॥३॥

स षड्विधो वातपित्तकफशोणितसन्निपातगन्तुनि- मित्तः। तस्य दोषरूपपञ्चजैनैलक्षणानि व्याख्यास्यामः। तत्र, वातशोफः कृष्णोऽरुणो वा परुषो मृदुरनवस्थिता- स्तोदादयश्चात्र वेदनाविशेषा भवन्ति। पित्तशोफः पीतो मृदुः सरको वा शोघ्रातुसार्थावादयश्चात्र वेदनाविशेषा भवन्ति, श्लेष्मश्चयशुः पाण्डुः कठिनः स्निग्धः शीतः स्निग्धो मन्दानुसारी कण्डवादयश्चात्र वेदनाविशेषा भवन्ति। सर्वैर्वावेदनः सन्निपातश्चयशुः। पित्तवच्छोणि- तजोऽतिकृष्णश्च, पित्तरक्तलक्षण आगन्तुलौहिताव- भासश्च ॥ ४ ॥

यह शोथ छै प्रकार का है। यथा—वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, रक्तजन्य, सन्निपातजन्य और आगन्तुज। इस शोथ के दोषों को बतानेवाले लक्षणों को कहते हैं। यथा—वातजन्य

शोथ लाल वा काला, कठिन, कौमल अस्थिर एवं तोद (सुई के चुभने के समान वेदना), छेदन, भेदन आदि वेदनायें होती हैं। पित्तजन्य शोथ—पीला, कोमल, रक्तयुक्त, शीघ्र फैलनेवाला, ओष, चोष, दाह आदि वेदना (जलने के समान) होती है। कफजन्य शोथ—पाण्डु या सफेद, कठिन, शीत, स्निग्ध, धीरे धीरे फैलनेवाला, उसमें कण्डू, गुर्दव, सुप्ति आदि वेदनायें होती हैं। सन्निपातजन्य शोथ में—सब दोषों का रक्त मिश्रित होता है और सब प्रकार की वेदनायें होती हैं। रक्तजन्य शोथ में—पित्त के समान लक्षण होते हैं शौर रक्त अतिकाला रहता है। आगन्तुज शोथ में—पित्तजन्य, रक्तजन्य शोथ के लक्षण मिश्रित रहते हैं और रक्त की चमक रहती है। इसी से कहा है—“बाह्यस्त्वचो दूषयिताऽभिघातः काष्ठारमशस्त्राग्निविषाय- साद्यैः, आगन्तुहेतुः।” चरक ॥४॥

स यदा बाह्याभ्यन्तरैः क्रियाविशेषैर्न संभावितः प्रशमयितुं क्रियाविपर्ययाद्वृद्धुत्वाद्वा दोषाणां तदा पाका- भिमुखो भवति। तस्यामस्य पच्यमानस्य पक्षस्य च लक्षणमुच्यमानमुपधारय। तत्र, मन्दोऽमता त्वकसर्वा- ता शीतशोफता स्थैर्यं मन्दवेदनताऽल्पशोफता चामलक्षण- मुदिर्ध, सूचोभिरिव निस्तुद्यते, दृश्यत इव पिपीलिकाभिः, ताभिश्च संसर्प्यत इव, लिद्यत इव शस्त्रेण, भिद्यत इव, शक्तिभिः, ताक्यत इव दण्डेन, पीड्यत इव पाणिना, घट्यत इव चाङ्कुल्या, दह्यते पच्यत इव चामिक्षारा- भ्याम्, ओषचोषपरीदाहाश्च भवन्ति, वृश्चिकविद्र इव च स्थानासनशयनेषु न गान्तिमुपैति, आश्मातवस्तिरिवा- ततश्च शोफो भवति, त्वग्वैवर्ण्यं शोफाभिवृद्धिर्वैरदाह- पिपासा भक्तारुचिश्च पच्यमानलिङ्गं, वेदनोपशान्तिः पाण्डुताऽल्पशोफता बलोप्रादुर्भावस्त्वकपरिपुटनं निम्न- दशनमङ्कुल्याऽवपीडिते प्रत्युन्मननं, बस्ताविबोदकसं- चरणं पूरस्य प्रपीडयत्येकमन्तमन्ते चावपीडिते, मुहुर्मुहुः स्तोदः कण्डूरुन्तता व्याघ्रैरुपद्रवशान्तिर्भक्ताभिकाङ्क्षा च पक्वलिङ्गम्। कफजेषु तु रोगेषु गम्भीरगतिर्त्वादभि- घातजेषु वा केषुचिदसमस्तं पक्वलक्षणं दृष्ट्वा पक्वमप- क्वमिति मन्यमानो भिषग्नोहमुपैति, तत्र हि स्वरसर्वाणां शीतशोफता स्थैर्यमल्परुजताऽश्मवृच्छ घनता, न तत्र मोहमुपेयादिति ॥ ५ ॥

यह शोथ जब बाह्य (आलेपन आदि) आभ्यन्तर (क्वाप, पान, वमन, विरेचन आदि) उपचारों से शान्त नहीं होता तब अवतरण आदि क्रियाओं के विपर्यय से या दोषों की प्रबलता होने से पकने लगता है। इस आमशोथ के पच्यमान (पाका भिमुख) एवं पक्व (पक जाने) के लक्षण कहता है। यथा—आम शोथ के लक्षण—थोड़ी उष्णमा, त्वचा के समान वर्ण (रक्त)