भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० १७ ]

सूत्रस्थानम्

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सृजन में ठण्ड, कठिनाता, पीड़ा का थोड़ा होना, सूजन में कमी—ये आमशोथ के लक्षण हैं। पञ्चमान शोथ—सूर्य के जुमने के समान पीड़ा, चिउटियों के चलने के समान प्रतीति, शस्त्र द्वारा छेदन करने के समान, शक्ति से भेदन करने के समान, दण्ड से ताड़न करने की तरह, हाथों से पीड़न करने की तरह, अंगुलि द्वारा चलाने (हिलाने) के समान, अग्नि एवं क्षार से—जलाने या पकाने की भाँति अनुभव होता है, ओष (एक भाग में दाह), पाख में रक्खी अग्नि के समान दाह प्रतीति, चारों ओर सारे सृजन में दाह होता है बिच्छू के काटे हुए पुखुर की भाँति, न तो बैठने में, न उठने में, न चलने में, न लेटने में किसी भी प्रकार से शान्ति नहीं मिलती। भरे हुए मूत्राशय के समान फूला एवं झर्रियों (त्वचा के संकोच) रहित शोथ होता है। त्वचा का रङ्ग बदलना, शोफ का उत्तरोत्तर बदलना, खुर, दाह, प्यास, भोजन में अरुचि, ये पञ्चमान शोफ के लक्षण हैं। पुखुर शोथ के लक्षण—वेदना की शान्ति, पाण्डुता, सृजन का घटना, झर्रियों का आ जाना, त्वचा का विदीर्ण होना, अंगुलि से दबाने पर नीचे दब जाना (गड़ढा होना) और फिर ऊपर उठ जाना, बस्ति में पानी की भाँति गति करना—अर्थात्—एक पार्श्व में दबाने से—दूसरे पार्श्व में भर जाना (Thrill), बार-बार जुमने के समान पीड़ा, कण्डू, (पक्वशोथ में विदाह न रहने से पित्त के लक्षण नहीं होते), सृजन का उन्नत होना, उग्रद्वो की शान्ति, भोजन में रुचि होना—ये पक्व शोथ के लक्षण हैं।

कफजन्म योग में शोथ की गति के गम्भीर (गहरी) होने से, एवं अभिघातजन्म शोथों में समस्त पक्व लक्षणों को न देखकर यह शोथ पका है या नहीं इस प्रकार का संशय (मोह) कई बार उत्पन्न हो जाता है। इन अवस्थाओं में—यदि बाहर से शोथ का रङ्ग त्वचा के समान हो, शोफ में बाहर शीतलता हो (अन्दर उष्णता), स्थूलता, वेदना की कमी, शिला के समान कठोरता हो तो भी संशय नहीं करना चाहिये—(शोथ को पक्व समझना चाहिये) कहा भी है 'न मोहमुपेयात्-यत्तस्त् रक्तपाकमाचक्षते वृद्धाः'।

वि० मन्तव्य—अवस्था भेद से त्रण शोफ के तीन प्रकार हैं—१—आम-कच्चा फोड़ा, २—पञ्चमान—पकता फोड़ा, ३—पक्व—पका हुआ फोड़ा। इस सूत्र में इन तीनों अवस्थाओं के लक्षण कहे गये हैं। कफजन्म तथा अभिघातजन्म शोफ में गहरा नीचरी पाक होता है और ऊपर से पका प्रतीत नहीं होता, अतः सन्देह हो जाता है कि पका है अथवा कच्चा है, परन्तु कुशल चिकित्सक को सन्देह (शोका) नहीं होता। वह अपने अनुभव से जान लेता है और चौरा लगाकर पूय निकाल देता है और फिर शोधन रोपण आदि उपचार करता

रहता है। इनके अतिरिक्त अन्य त्रण शोफ ऊपर से पक जाते हैं और फूट भी जाते हैं। संक्षेपतः आमशोथ में वेदनायें मन्द, पञ्चमान में तीव्र होती हैं और पक्व में पुनः मन्द हो जाती हैं।

भवन्ति चात्र— आमं विपञ्चमानं च सम्यक् पक्वं च यो भिषक्। जानीयात् स भवेद्वैद्यः शेषास्तस्करवृत्तयः ॥ ६ ॥ वाताट्टे नास्ति रुजा न पाकः। पिताट्टे नास्ति कफाच्च पूयः ॥ तस्मात् समस्तान् परिपाककाले।

पचन्ति शोफांश्चैव एव दोषाः ॥ ७ ॥ जो वैद्य, आमशोथ, पञ्चमानशोथ और पक्वशोथ को भली प्रकार से पहिचानता है, वह वास्तव में "वैद्य" कहलाने योग्य है, शेष सब प्राण-धन के चुराने से चोर हैं। एक दोष के कारण उत्पन्न हुआ शोथ भी पकने के समय तीनों दोषों द्वारा पकता है—वात के बिना शोथ में पीड़ा नहीं होती-पित्त के बिना पाक नहीं होता, कफ के बिना पूय नहीं होती, इसलिये पकते समय शोफ को तीनों दोष एकत्रित होकर पकाते हैं। ६, ७।

काठान्तरेणाभ्युदितं तु पित्तं कृत्वा वशे वातकफौ प्रसह्य। पचत्यतः शोणितमेव पाको मतोऽपरेषां विदुषां द्वितीयः ॥ ८ ॥

शोथ के परिपाक के विषय में विद्वानों का एक और भी मत है। प्रकोप, प्रसार, स्थान, संश्रय-काल विधि से बड़े हुए पित्त को वश में करके तथा वात एवं कफ को घटाकर रक्त, शोथ को पकाता है, यह दूसरे विद्वानों का विचार है। घाणेकर जी का कहना है कि बढ़ा हुआ पित्त-बल से वात और कफ को विवश करके रक्त को पका देता है।

वि० मन्तव्य—घाणेकर जी वाला अर्थ ही ठीक है, कारण वात एवं कफ स्वभावतः पाक नहीं कर सकते केवल पित्त ही पाक कर सकता है और रक्त को पकाकर पूयरूप में परिणत कर देता है। इतना ही नहीं रक्त भी पित्त का समानधर्मा है अतः वही पकता भी है और तत्स्थानीय मांस वसा आदि सौम्य होने से पकते नहीं, अपितु गलते-सड़ते हैं भले ही पकते प्रतीत होते हों ॥ ८ ॥

तत्र आमच्छेदे मांससिरास्तायुसन्ध्यस्थिव्यापादनसति- मात्रं शोणिततिप्रवृत्तिवेदनाप्रादुर्भावोऽवदरणमनेकोपद्र- वदर्शनं क्षतविद्रधिर्वा भवति। स यदा भयमोहाभ्यां पकमप्यपकमिति सन्धमानश्चिरमुपेक्षते व्याधिं वैद्यस्तदा गम्भीरानुगतो द्वारमलभमानः पूयः स्वमाश्रयमवदयोरसङ्गं महान्तमवकाशं कृत्वा नाडीं जनयित्वा कृच्छ्रााधयो भव- त्यसाधयो वेति ॥ ९ ॥